सूखे के बीच मडिवालप्पा बन्नूर की पहल, हर सप्ताह 10-15 बंदरों के झुंड को केले और पानी
बैलहोंगल (बेलगावी)। इंसानों की बस्ती और खेतों में पहुंचने पर जिन बंदरों को अक्सर पत्थर और पटाखों से भगाया जाता है, उन्हीं के लिए बैलहोंगल के मैस संचालक मडिवालप्पा बन्नूर पिछले तीन वर्षों से भोजन और पानी का इंतजाम कर रहे हैं। सूखे की तपिश हो या बारिश का मौसम, उनकी यह सेवा लगातार जारी है।
बैलहोंगल के पर्यटन विश्राम गृह (सर्किट हाउस) में संचालित मैस के पास हर सप्ताह करीब 10 से 15 बंदरों का झुंड लगभग तय समय पर पहुंचता है। बन्नूर उनके लिए केले और पीने का पानी रखते हैं। बंदर भोजन करने और पानी पीने के बाद लौट जाते हैं। कई बार वे आसपास के घरों तक भी पहुंचते हैं, जहां रोटी खाने के बाद कुछ देर रुकते हैं।
तीन साल में बना अपनापन
लगातार तीन वर्षों से भोजन और पानी मिलने के कारण बंदरों का इस स्थान से जैसे रिश्ता बन गया है। उनका हर सप्ताह एक ही जगह पहुंचना अब स्थानीय लोगों के लिए भी परिचित दृश्य बन चुका है।
बन्नूर कहते हैं कि जो जीव अपनी भूख-प्यास शब्दों में नहीं बता सकते, उनके लिए भोजन और पानी उपलब्ध कराना भी इंसान की जिम्मेदारी है। खास बात यह है कि वे बिना किसी प्रचार के नियमित रूप से यह सेवा कर रहे हैं।
स्थानीय लोगों ने उनकी पहल की सराहना करते हुए कहा कि पशु-प्रेम केवल शब्दों में नहीं, बल्कि व्यवहार में दिखना चाहिए। बन्नूर की पहल बताती है कि बेजुबान जीवों के लिए संवेदना दिखाने को बड़े संसाधनों की नहीं, सिर्फ एक छोटी-सी पहल और इच्छाशक्ति की जरूरत होती है।
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