“बेलगावी कर्नाटक का अभिन्न हिस्सा” प्रस्ताव टालने पर कानूनी सवाल तेज
बेलगावी. “बेलगावी कर्नाटक का अभिन्न अंग है” इस एक पंक्ति के प्रस्ताव को सीधे पारित करने के बजाय मामले को राज्य सरकार की राय के लिए भेजने संबंधी महानगर निगम महापौर (मेयर) के निर्णय पर अब कानूनी हलकों में गंभीर सवाल उठने लगे हैं।
वरिष्ठ अधिवक्ता और जल विशेषज्ञ मोहन कातरकी ने स्पष्ट कहा है कि बेलगावी को कर्नाटक का हिस्सा घोषित करने से रोकने वाला कोई कानूनी प्रावधान नहीं है। केवल इस आधार पर कि महाराष्ट्र सरकार ने सीमा विवाद को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है, महानगर निगम किसी प्रस्ताव पर चर्चा या उसे पारित करने से पीछे नहीं हट सकती।
यह भावनात्मक नहीं, कानूनी तथ्य
मोहन कातरकी के अनुसार बेलगावी का कर्नाटक का हिस्सा होना कोई भावनात्मक या राजनीतिक घोषणा नहीं, बल्कि संसद द्वारा पारित राज्य पुनर्गठन अधिनियम-1956 के तहत स्थापित कानूनी सत्य है। यह कानून भारतीय संविधान के अनुच्छेद 3 और 4 के आधार पर बनाया गया था और उसी प्रक्रिया में बेलगावी को कर्नाटक में शामिल किया गया।
उन्होंने कहा कि महानगर निगम के समक्ष रखा गया प्रस्ताव कोई नई सीमा तय करने का प्रयास नहीं था, बल्कि पहले से स्थापित संवैधानिक स्थिति की पुनर्पुष्टि मात्र था।
मेयर के फैसले पर उठे सवाल
कातरकी ने सवाल उठाया कि जब कोई कानूनी बाधा ही नहीं है, तब “मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है, इसलिए सरकार की राय ली जाएगी” जैसी मेयर की रूलिंग किस कानूनी आधार पर दी गई।
इस मुद्दे पर कन्नड़ समर्थक संगठनों ने भी तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। उनका कहना है कि बेलगावी को कर्नाटक का हिस्सा बताने जैसे सरल प्रस्ताव से भी पीछे हटना कन्नड़ स्वाभिमान को ठेस पहुंचाने वाला कदम है।
राजनीतिक असहजता से बचने की कोशिश?
कन्नड़ संगठनों के बीच यह आशंका भी जताई जा रही है कि प्रशासन ने राजनीतिक असहजता से बचने के लिए इस संवेदनशील विषय को सरकार के पाले में डाल दिया है, जबकि कानूनी रूप से प्रस्ताव पारित करने में कोई बाधा नहीं थी।
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