कर्नाटक में खनन पट्टों के विलय को सुप्रीम कोर्ट की मंजूरीकर्नाटक में खनन पट्टों के विलय को सुप्रीम कोर्ट की मंजूरी

ए, बी और सी श्रेणी के खनन पट्टों के साथ ‘वर्जिन फॉरेस्ट’ को एक ब्लॉक में शामिल करने की अनुमति

जंगल में खनन के लिए अलग से लेनी होगी वैधानिक मंजूरी

हुब्बल्ली। कर्नाटक में खनन व्यवस्था को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण आदेश दिया है। न्यायालय ने राज्य में ए, बी और सी श्रेणी के विभिन्न खनन पट्टों तथा अब तक खनन से अछूती प्राकृतिक वन भूमि (वर्जिन फॉरेस्ट) को नीलामी के लिए एक ब्लॉक या इकाई के रूप में समेकित करने की अनुमति दी है। हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस व्यवस्था से वन भूमि पर स्वत: खनन का अधिकार नहीं मिलेगा।

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत तथा न्यायाधीश जयमाल्य बागची और वी. मोहना की पीठ ने कहा कि पट्टों का समेकन तभी किया जा सकता है, जब इससे न्यायालय की ओर से निर्धारित पर्यावरणीय और अन्य सुरक्षा उपाय प्रभावित न हों। पीठ ने इस प्रक्रिया को ऑपरेशनल रेशनलाइजेशन यानी परिचालन को तर्कसंगत बनाने का कदम बताया।

वन भूमि पर खनन के लिए पूर्व अनुमति जरूरी

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी ब्लॉक में वर्जिन फॉरेस्ट को शामिल करने का अर्थ उस क्षेत्र में खनन की अनुमति देना नहीं है। ऐसी वन भूमि में खनन शुरू करने से पहले वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 के तहत आवश्यक पूर्व अनुमति लेना अनिवार्य होगा।

सिर्फ संयुक्त पट्टा व्यवस्था लागू होने से उन क्षेत्रों में खनन की स्वत: अनुमति नहीं मिलेगी, जहां आवश्यक वैधानिक मंजूरियां अभी लंबित हैं।

बोली लगाने वाले को देना होगा लिखित आश्वासन

कोर्ट के निर्देश के अनुसार, सफल बोलीदाता को लिखित रूप से आश्वासन देना होगा कि सभी आवश्यक वैधानिक और पर्यावरणीय मंजूरियां मिलने तक वर्जिन फॉरेस्ट में किसी तरह का खनन नहीं किया जाएगा।

वहीं, ब्लॉक के उन हिस्सों में जहां पहले से खनन हो चुका है या गतिविधियां संचालित हैं, वहां मौजूद वैधानिक अनुमतियों को खनिज एवं खनिज (विकास एवं विनियमन) अधिनियम, 1957 की धारा 8बी के तहत नए पट्टाधारक को हस्तांतरित किया जा सकेगा।

पर्यावरण को लेकर जताई गई आपत्ति

‘समाज परिवर्तन समुदाय’ की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने खनन पट्टों के विलय का विरोध किया। उन्होंने तर्क दिया कि खनन पट्टों को वर्जिन फॉरेस्ट के साथ जोडऩे से पर्यावरण को गंभीर नुकसान का खतरा है और इससे पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर खनन का रास्ता खुल सकता है।

वहीं, कई खनन कंपनियों से जुड़े मामले में न्यायालय के अमिकस क्यूरी वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान की दलीलें सुनने के बाद पीठ ने अपना आदेश जारी किया।

2013 में हुआ था ए, बी और सी श्रेणी का वर्गीकरण

कर्नाटक में लौह अयस्क खनन की निगरानी कर रही न्यायिक व्यवस्था के तहत सुप्रीम कोर्ट ने 2013 में खनन पट्टों का वर्गीकरण किया था। यह वर्गीकरण केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति (सीईसी) और संयुक्त जांच दल की ओर से सामने आए अवैध खनन एवं अतिक्रमण के निष्कर्षों के आधार पर किया गया था।

ए श्रेणी में वे खदानें रखी गई थीं, जहां कोई अवैध गतिविधि नहीं पाई गई थी। बी श्रेणी में स्वीकृत क्षेत्र से बाहर, 15 प्रतिशत तक खनन करने वाले पट्टे शामिल थे। वहीं, सी श्रेणी में इससे अधिक गंभीर उल्लंघन तथा वन कानूनों के स्पष्ट उल्लंघन वाले मामले रखे गए थे। सी श्रेणी के पट्टे रद्द कर दिए गए थे, जबकि कड़े शर्तों के साथ ए और बी श्रेणी की कुछ खदानों को दोबारा खोलने की अनुमति दी गई थी।

 

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By Bharat Ki Awaz

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