कर्नाटक हाईकोर्ट में 1993 में मृत व्यक्ति के नाम से दायर हुई थी रिट याचिका, 1988 में हो चुका था निधन
4 एकड़ 21 गुंटे जमीन का विवाद
कोर्ट ने याचिका खारिज कर 10 हजार रुपए जुर्माना लगाया
हुब्बल्ली। कर्नाटक हाईकोर्ट में करीब 33 साल पुराने भूमि विवाद की सुनवाई के दौरान ऐसा तथ्य सामने आया, जिसने न्यायिक प्रक्रिया पर भी सवाल खड़े कर दिए। जिस व्यक्ति के नाम से वर्ष 1993 में हाईकोर्ट में रिट याचिका दाखिल की गई थी, उसका निधन इससे पांच साल पहले ही 8 अगस्त 1988 को हो चुका था। मामले की सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आने पर हाईकोर्ट ने याचिका को ही अमान्य मानते हुए संबंधित उत्तराधिकारियों की याचिका खारिज कर दी।
4 एकड़ 21 गुंटे जमीन से जुड़ा मामला
मामला मंड्या जिले के श्रीरंगपट्टण तालुक के बेलवाड़ी गांव की 4 एकड़ 21 गुंटे जमीन से जुड़ा है। वर्ष 1981 में लैंड ट्रिब्यूनल ने सी. निंगम्मा को इस जमीन का कब्जेदारी अधिकार प्रदान किया था। इस आदेश को चुनौती देते हुए 1993 में सी. मरियप्पा के नाम से हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर की गई। याचिका उनके पावर ऑफ अटॉर्नी धारक के माध्यम से दाखिल हुई थी।
वर्ष 2001 में हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए मामले को पुनर्विचार के लिए लैंड ट्रिब्यूनल को वापस भेज दिया था।
33 साल बाद सामने आया चौंकाने वाला तथ्य
बाद में लैंड ट्रिब्यूनल के 2023 के आदेश को मरियप्पा के कानूनी वारिसों ने हाईकोर्ट में चुनौती दी। सुनवाई के दौरान प्रतिवादियों की ओर से दलील दी गई कि जिस समय 1993 में याचिका दाखिल हुई, उस समय मरियप्पा जीवित ही नहीं थे।
हाईकोर्ट ने इस दलील को सही पाया। न्यायाधीश ई.एस. इंदिरेश ने कहा कि याचिकाकर्ता पक्ष की ओर से इस तथ्य पर संतोषजनक स्पष्टीकरण भी नहीं दिया गया।
बेटी के हलफनामे पर भी उठे सवाल
कोर्ट ने पाया कि मरियप्पा की बेटी सुमलम्मा ने लैंड ट्रिब्यूनल के समक्ष दिए हलफनामे में केवल इतना कहा था कि उनके पिता की मृत्यु ‘बहुत पहले’ हो चुकी थी। लेकिन उनकी मृत्यु की वास्तविक तारीख का उल्लेख नहीं किया गया था।
कोर्ट ने यह भी गौर किया कि मामले की आगे की कार्यवाही के दौरान भी मरियप्पा की मृत्यु के तथ्य को पूरी तरह स्पष्ट नहीं किया गया।
2001 का आदेश भी हुआ निष्प्रभावी
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी मृत व्यक्ति के नाम से दाखिल रिट याचिका वैध रूप से कायम नहीं रह सकती। ऐसे में वर्ष 2001 में हाईकोर्ट द्वारा मामले को लैंड ट्रिब्यूनल को पुनर्विचार के लिए भेजने वाला आदेश भी कानूनी प्रभाव नहीं रखता।
इसके साथ ही वर्ष 1981 में निंगम्मा को दिए गए कब्जेदारी अधिकार का मूल आदेश प्रभावी और अंतिम माना गया।
10 हजार रुपए जुर्माना
हाईकोर्ट ने मरियप्पा के कानूनी वारिसों की संबंधित याचिका खारिज करते हुए 10 हजार रुपए का जुर्माना भी लगाया। यह राशि कर्नाटक राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण में जमा कराने का आदेश दिया गया।
कोर्ट ने कहा कि महत्वपूर्ण तथ्यों का पूर्ण खुलासा किए बिना संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत राहत मांगने वाला पक्ष ‘समान एवं न्यायसंगत राहत’ का हकदार नहीं हो सकता।
मामले ने उठाए कई सवाल
मृत्यु के पांच साल बाद मृत व्यक्ति के नाम से याचिका दाखिल होना और उसके आधार पर वर्षों तक कानूनी प्रक्रिया चलना अब चर्चा का विषय बन गया है। यह मामला अदालत में दाखिल दस्तावेजों की सत्यता, पक्षकार की स्थिति और न्यायिक प्रक्रिया के समक्ष सभी महत्वपूर्ण तथ्यों के पूर्ण खुलासे की अहमियत को रेखांकित करता है।
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