कर्नाटक पर गहराया जल संकट का खतरा

भूजल दोहन 70 प्रतिशत के पार पहुंचने की आशंका

गर्मियों में सूख सकते हैं लाखों बोरवेल

हुब्बल्ली। कर्नाटक में सूखे की गंभीर स्थिति के बीच भूजल संकट और गहराने के संकेत मिल रहे हैं। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि कम बारिश, भूजल के अपर्याप्त पुनर्भरण और बढ़ती जल खपत के कारण इस वर्ष राज्य में भूजल दोहन 70 प्रतिशत की सुरक्षित सीमा को पार कर सकता है। यदि हालात नहीं सुधरे तो आगामी गर्मियों में लाखों बोरवेल सूखने और पेयजल संकट गहराने की आशंका है।

राज्य सरकार पहले ही 227 तालुकों को सूखाग्रस्त घोषित कर चुकी है। कर्नाटक राज्य प्राकृतिक आपदा निगरानी केंद्र के अनुसार, राज्य के 14 प्रमुख जलाशयों में पिछले वर्ष के 827 टीएमसी फीट के मुकाबले फिलहाल केवल 540 टीएमसी फीट पानी शेष है। यानी जल भंडारण में 287 टीएमसी फीट की कमी दर्ज की गई है।

जनवरी 2025 की भूजल रिपोर्ट के अनुसार, राज्य में भूजल दोहन 66.49 प्रतिशत था। विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा सूखे के कारण यह स्तर 70 प्रतिशत से ऊपर जा सकता है। राज्य के 45 तालुकों में भूजल दोहन पहले ही उपलब्ध संसाधनों से अधिक हो चुका है, जबकि 47 अन्य तालुके संकट और अर्ध-संकट की श्रेणी में हैं।

विशेषज्ञों ने वर्षा जल संचयन, भूजल पुनर्भरण और जल संरक्षण को प्राथमिकता देने की सलाह दी है। उनका कहना है कि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो आने वाली गर्मियों में कर्नाटक के कई हिस्सों में जल संकट विकराल रूप ले सकता है।

69 तालुकों में भूजल की गुणवत्ता पर चिंता

भूजल का संकट केवल पानी की मात्रा तक सीमित नहीं है। इसकी गुणवत्ता भी चिंता का विषय बन रही है। राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण से जुड़े सूत्रों के अनुसार, भूजल की गुणवत्ता की जांच में 17 तालुकों में लवणता, 41 में नाइट्रेट, 15 में फ्लोराइड और 13 तालुकों में यूरेनियम की मौजूदगी दर्ज की गई है।

भूजल स्तर में गिरावट और दूषित पानी पर निर्भरता बढऩे से इन समस्याओं के और गंभीर होने की आशंका है। दूषित पानी के लंबे समय तक सेवन से गुर्दे, यकृत और हड्डियों से जुड़ी स्वास्थ्य समस्याओं का जोखिम बढ़ सकता है। इसलिए नियमित जल गुणवत्ता जांच और सुरक्षित पेयजल की उपलब्धता सुनिश्चित करना जरूरी है।

जून तक पानी का सावधानी से इस्तेमाल करने की सलाह

जल संरक्षण विशेषज्ञ विश्वनाथ श्रीकंठय्या ने सलाह दी है कि अच्छी बारिश के दौरान पानी का संग्रह किया जाए और सूखे के समय उसका योजनाबद्ध तरीके से इस्तेमाल हो। उन्होंने अगले वर्ष जून तक पानी का सावधानीपूर्वक उपयोग करने पर जोर दिया है।

विशेषज्ञों का कहना है कि कृषि क्षेत्र में ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई प्रणालियों को बढ़ावा देने की जरूरत है। पानी की कमी के लिए केवल किसानों को जिम्मेदार ठहराने के बजाय जल संग्रहण, वितरण, प्रबंधन और उपयोग की मौजूदा व्यवस्था में सुधार पर भी ध्यान देना चाहिए।

संकट से निपटने के लिए जरूरी कदम

विशेषज्ञों का कहना है कि वर्षा जल संचयन, भूजल पुनर्भरण, सिंचाई में जल दक्षता और पेयजल स्रोतों की नियमित गुणवत्ता जांच को प्राथमिकता देनी होगी। समय रहते प्रभावी उपाय नहीं किए गए तो आने वाली गर्मियों में कर्नाटक के कई हिस्सों में जल संकट और गहरा सकता है।

 

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By Bharat Ki Awaz

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