कोगनूर के तिरकप्पा मडिवाळर और वीरय्या हिरेमठ ने 1943 में दिया सर्वोच्च बलिदान
शिरहट्टी (गदग)। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान देशभर में अंग्रेजी शासन के खिलाफ व्यापक जनाक्रोश देखने को मिला था। इस दौरान 550 डाकघरों, 250 रेलवे स्टेशनों, 70 से अधिक पुलिस थानों और 83 से अधिक सरकारी कार्यालयों को आंदोलनकारियों के आक्रोश का सामना करना पड़ा। ब्रिटिश पुलिस की गोलीबारी में सैकड़ों स्वतंत्रता सेनानियों ने प्राण न्योछावर किए। शिरहट्टी तालुक का कोगनूर गांव भी ऐसे ही वीरतापूर्ण संघर्ष का साक्षी रहा है।
अंग्रेजों के लिए चुनौती बने मैलार महादेव और उनके सहयोगी कोगनूर के तिरकप्पा मडिवाळर तथा वीरय्या हिरेमठ ने 1 अप्रेल 1943 को होसरित्ती राजस्व कार्यालय पर हमला करने के दौरान ब्रिटिश सैनिकों की गोली का सामना किया और शहीद हो गए।
मैलार महादेव के नेतृत्व में आंदोलन
मैलार महादेव 1930 के नमक सत्याग्रह और 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में कर्नाटक से भाग लेने वाले प्रमुख स्वतंत्रता सेनानियों में शामिल थे। उन्होंने कोगनूर, हेब्बाळ और वडवी गांवों के 22 स्वतंत्रता सेनानियों को संगठित किया था। आंदोलनकारी मागड़ी-मुळगुंद मार्ग और गुडगेरी में बसें रोककर डाक सामग्री अपने कब्जे में लेते थे।
कोगनूर के 18 सेनानी अंग्रेजों की राजस्व वसूली का विरोध करते थे। अंग्रेजों से जुड़े गोविनकोप्पा, होन्नत्ती और बिज्जूर के चावड़ी भवनों को भी नुकसान पहुंचाया गया। लगातार बढ़ते आंदोलन से ब्रिटिश प्रशासन परेशान हो गया था।
जेल में बच्चे को जन्म दिया
1943 में कोगनूर के गोणेप्पा कमत और उनकी पत्नी यल्लम्मा कमत भी स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल हुए। दोनों को अंग्रेजों ने गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। जेल में ही यल्लम्मा कमत ने एक बच्चे को जन्म दिया।
शिरहट्टी तालुक के स्वतंत्रता सेनानियों में कोगनूर के वीरय्या हिरेमठ, तिरकप्पा मडिवाळर, गोणेप्पा कमत, यल्लम्मा कमत, गुड्डप्पा डिल्लेप्पनवर, निंगप्पा कूरगुंद, वीरप्पा अंगड़ी, नीलप्पा डिल्लेप्पनवर, वीरभद्रगौड़ा पाटील, नसीमप्पा चन्नूर, फकीरड्डी रड्डेर, फकीरप्पा कूरगुंद, भगवंतप्पा बूदानूर, शिवय्या हिरेमठ, वासुरड्डी रड्डेर, रामण्णा कूरगुंद, चन्नप्पा कूरगुंद और तिप्पण्णा मडिवाळर सहित 18 लोग शामिल थे।
वडवी के वेंकण्णाचार्य वाई, नागरमडुवु के मुदुकप्पा हडपद, हेब्बाळ के इष्टलिंगय्या और हालप्पा उडचण्णवर सहित तालुक के कुल 22 स्वतंत्रता सेनानी मैलार महादेव के नेतृत्व वाले आंदोलन में शामिल हुए थे। ग्रामीणों का कहना है कि इतने साहसी स्वतंत्रता सेनानियों को जन्म देने वाले शिरहट्टी के योगदान को इतिहास के पन्नों में अपेक्षित स्थान नहीं मिल पाना दुर्भाग्यपूर्ण है।
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