दावणगेरे में नवपद ओली का आध्यात्मिक संदेश
दावणगेरे. काईपेट स्थित श्रीशंखेश्वर पाश्र्व राजेन्द्र गुरुमंदिर संघ में विराजित साध्वी भव्यगुणा ने श्रद्धालुओं को शाश्वती नवपद ओली का महत्व विस्तार से समझाया। उन्होंने कहा कि नवपद आयंबिल ओली जैन धर्म का एक महत्वपूर्ण बाह्य तप है, जिसे वैज्ञानिक दृष्टि से इस प्रकार संयोजित किया गया है कि यह मन, शरीर और आत्मा—तीनों को लाभ पहुंचाता है।
साध्वी ने कहा कि यह तप स्वाद नियंत्रण की साधना है, जिसका उद्देश्य आत्मिक उन्नति और कर्म बंधनों से मुक्ति प्राप्त करना है। यह नौ दिवसीय पर्व वर्ष में दो बार-चैत्र (मार्च-अप्रेल) और अश्विन (अक्टूबर-नवंबर) माह में सप्तमी से पूर्णिमा तक मनाया जाता है। इसका मूल उद्देश्य नवपद के प्रति श्रद्धा और समर्पण प्रकट करना है, जिसका उल्लेख नवकार मंत्र में भी मिलता है।
नवपद की व्याख्या करते हुए साध्वी भव्यगुणा ने कहा कि इसे सिद्धचक्र भी कहा जाता है, जो एक गोलाकार यंत्र होता है। इसमें सिद्ध को शीर्ष स्थान, अरिहंत को मध्य में, आचार्य को दाहिनी ओर, उपाध्याय को नीचे और साधु को बाईं ओर स्थापित किया गया है।
साध्वी शीतलगुणा ने नवकार मंत्र के दूसरे पद ‘सिद्ध’ का महत्व बताते हुए कहा कि सिद्ध वे आत्माएं हैं, जो सभी कर्मों से मुक्त होकर जन्म-मृत्यु के चक्र से परे हो चुकी हैं। वे निराकार, शुद्ध, प्रबुद्ध और पूर्णत: मुक्त होती हैं। मोक्ष प्राप्ति के बाद आत्मा सिद्ध बन जाती है, जो शाश्वत शांति, संतुलन और आनंद की अवस्था में स्थित रहती है।
साध्वी ने कहा कि सिद्ध को देव तत्वों में स्थान प्राप्त है और सिद्धचक्र यंत्र में उन्हें सर्वोच्च स्थान दिया गया है। उनका प्रतीक रंग लाल माना जाता है और उनमें आठ दिव्य गुण विद्यमान होते हैं।
कार्यक्रम में साध्वीवृंद की सेवा का लाभ संजय पोरवाल, पुरीबाई पोरवाल, सुवर्णा पोरवाल, अन्नपूर्णा, अरुण कुमार, भूमिका, प्रिशा और जशवी सहित अनेक श्रद्धालुओं ने प्राप्त किया।
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