सुपारी फसल बचाने को टैंकरों पर निर्भर किसान
बोरवेल सूखे, भूजल स्तर गिरा
महंगे पानी के बावजूद फसल बचाने की जद्दोजहद
चित्रदुर्ग. जिले में बढ़ती गर्मी और भूजल स्तर में लगातार गिरावट ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है। जल संकट के कारण कई बोरवेल सूख चुके हैं, जिससे खेतों में खड़ी सुपारी फसल को बचाना किसानों के लिए बड़ी चुनौती बन गया है। मजबूरी में किसान अब टैंकरों से पानी मंगाकर सिंचाई कर रहे हैं।
परंपरागत खेती से सुपारी की ओर रुझान
एक समय केवल पारंपरिक फसलें उगाने वाले इस क्षेत्र के किसान पिछले एक दशक से सुपारी खेती की ओर तेजी से बढ़े हैं। होललकेरे और होसदुर्ग क्षेत्र के किसान भी अब मलेनाडु क्षेत्र की तरह सुपारी उत्पादन करने लगे हैं। हालांकि, यह फसल अधिक पानी मांगती है, जिससे गर्मियों में संकट और गहरा जाता है।
कम बारिश ने बढ़ाई समस्या
पिछले वर्ष मानसून और उत्तर-पूर्वी बारिश दोनों ही कम होने के कारण तालाब, कुंड और जलाशय पर्याप्त नहीं भर पाए। इससे भूजल का पुनर्भरण नहीं हो सका और बोरवेल सूख गए। यहां तक कि 1000 फीट तक खुदाई करने पर भी कई जगह पानी नहीं मिल रहा है।
किसानों की पीड़ा
तुरुवनूर गांव के किसान मंजुनाथ ने बताया कि भद्रा परियोजना का पानी मिलने की उम्मीद में हमने सुपारी की खेती शुरू की थी, लेकिन एक दशक बीतने के बाद भी पानी नहीं आया। अब कम बारिश और सूखे के कारण फसल बचाना मुश्किल हो रहा है।
2017 के सूखे की याद ताजा
किसानों को वर्ष 2017 के भीषण सूखे की याद आज भी सताती है, जब हजारों एकड़ बागान नष्ट हो गए थे। हर साल गर्मियों में जल संकट बढऩे पर उस कठिन दौर की याद फिर ताजा हो जाती है।
महंगे पानी का सहारा
बोरवेल बंद होने के कारण किसान आसपास के खेतों से पानी खरीदने को मजबूर हैं। अधिक कीमत चुकाकर भी वे अपनी फसल को बचाने की कोशिश कर रहे हैं। इसके अलावा, तालाबों से टैंकरों में पानी भरकर खेतों तक पहुंचाया जा रहा है, जिसमें दूरी के अनुसार लागत तय की जाती है।
जलाशय पास, फिर भी संकट
हिरियूर तालुक के वाणिविलास सागर जलाशय में पानी उपलब्ध होने के बावजूद आसपास के कई गांवों में जल संकट बना हुआ है। भरमगिरी, गौनहल्ली, बलघट्टा, बीरेनहल्ली, कूणिकेरे और अन्य क्षेत्रों में बोरवेल सूख चुके हैं, जिससे किसान पूरी तरह टैंकरों पर निर्भर हो गए हैं।
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