सुपा जलाशय का जलस्तर पिछले वर्ष की तुलना में एक-तिहाई पर पहुंचा
विशेषज्ञों ने जताई चिंता
दांडेली (उत्तर कन्नड़). उत्तर कन्नड़ जिले की जीवनरेखा मानी जाने वाली काली नदी में इस वर्ष गर्मी के अंत तक चिंताजनक स्थिति देखने को मिल रही है। नदी के कई हिस्सों में पानी के भीतर रहने वाली चट्टानें और पथरीली संरचनाएं अब स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगी हैं, जिससे स्थानीय लोगों और पर्यावरण प्रेमियों में चिंता बढ़ गई है।
विशेषज्ञों के अनुसार, इसका मुख्य कारण सुपा जलाशय में जल भंडारण में आई भारी गिरावट है। कर्नाटक जल संसाधन विभाग के आंकड़ों के मुताबिक 10 जून 2026 को सुपा जलाशय में केवल 173.019 टीएमसी पानी उपलब्ध था, जो इसकी कुल जीवंत भंडारण क्षमता का मात्र 12.96 प्रतिशत है।
एक वर्ष में 19.5 प्रतिशत की गिरावट
पिछले वर्ष इसी अवधि में जलाशय 32.47 प्रतिशत भरा हुआ था। इस प्रकार एक वर्ष में जल भंडारण में लगभग 19.5 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है। केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण के आंकड़ों के अनुसार, 2 जून 2025 को जलाशय का जलस्तर 530.40 मीटर था, जो 2 जून 2026 को घटकर 526.57 मीटर रह गया। यानी एक वर्ष में 3.83 मीटर की गिरावट दर्ज की गई।
नदी का दायरा सिमटा, चट्टानें आईं नजर
काली नदी के निचले हिस्सों में जल प्रवाह कम होने से कई स्थानों पर पहले पानी में डूबी रहने वाली चट्टानें अब बाहर दिखाई देने लगी हैं। कुछ स्थानों पर नदी का फैलाव सिमटकर संकरे जलमार्ग जैसा हो गया है। स्थानीय मछुआरों और ग्रामीणों का कहना है कि ऐसे दृश्य सामान्यत: गंभीर सूखे के वर्षों में ही देखने को मिलते हैं।
पर्यावरण और आजीविका पर पड़ सकता है असर
विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन और वर्षा के अस्थिर पैटर्न के कारण काली नदी का प्रवाह प्रभावित हो रहा है। इसका असर केवल जल उपलब्धता तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि नदी की पारिस्थितिकी, मछलियों के प्रजनन, भूजल पुनर्भरण तथा नदी तट के गांवों की आजीविका पर भी पड़ सकता है।
मानसून से उम्मीदें
हालांकि जून के दूसरे सप्ताह से तटीय कर्नाटक में मानसून के सक्रिय होने की संभावना है और अच्छी बारिश होने पर सुपा जलाशय के जलस्तर में सुधार आ सकता है। इसके बावजूद मौजूदा आंकड़े और काली नदी में दिखाई दे रहे बदलाव उत्तर कन्नड़ जिले के जल संसाधनों के लिए गंभीर चेतावनी मानी जा रही है।
विशेषज्ञों का कहना है कि काली नदी में उभरती चट्टानें केवल गर्मी का संकेत नहीं, बल्कि भविष्य की जल प्रबंधन चुनौतियों की चेतावनी हैं।
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