एल नीनो के असर से मानसून कमजोर पडऩे की आशंका
कृषि विभाग ने बनाया व्यापक आपदा प्रबंधन खाका
हुब्बल्ली. एल नीनो के प्रभाव के कारण इस वर्ष राज्य में सामान्य से कम बारिश होने की आशंका के बीच किसानों में चिंता का माहौल है। हालांकि कृषि विभाग ने स्पष्ट किया है कि बारिश में कमी की स्थिति में भी किसानों को घबराने की जरूरत नहीं है। विभाग ने विभिन्न कृषि वैज्ञानिकों के परामर्श से सूखा और अल्पवृष्टि से निपटने के लिए विस्तृत वैकल्पिक फसल योजना तैयार की है।
जिलेवार तैयार की गई रणनीति
कृषि विभाग ने यह निर्धारित किया है कि यदि एक-दो सप्ताह तक बारिश नहीं होती है तो किस जिले में कौन-सी फसल अधिक उपयुक्त रहेगी और कौन-सी किस्में सूखा सहन करने में सक्षम होंगी। यह जानकारी कृषि विज्ञान केंद्रों और किसान संपर्क केंद्रों के माध्यम से किसानों तक पहुंचाई जा रही है।
मोटे अनाज और मिश्रित खेती पर जोर
बयलुसीमे (मैदानी) क्षेत्र के तुमकूरु, कोलार, चित्रदुर्ग और बेंगलूरु ग्रामीण जिलों में रागी, सामा, कोदो, कांगनी और अन्य मोटे अनाजों की खेती की सलाह दी गई है। वहीं दावणगेरे, विजयनगर और बल्लारी जैसे मध्य कर्नाटक क्षेत्रों में मक्का के स्थान पर रागी, सोयाबीन, सूरजमुखी और बाजरा जैसी फसलों को बढ़ावा दिया जा रहा है।
उत्तर कर्नाटक के बागलकोट, कलबुर्गी, रायचूर और कोप्पल जिलों में अल्प अवधि वाली अरहर की किस्मों और मिश्रित खेती को अपनाने की सिफारिश की गई है। यदि 15 जुलाई के बाद भी पर्याप्त बारिश नहीं होती है तो सूरजमुखी को बेहतर विकल्प माना गया है।
नमी संरक्षण और सूक्ष्म सिंचाई पर बल
विशेषज्ञों ने खेतों में नमी बनाए रखने, जैविक खाद और मल्चिंग के उपयोग, बीज उपचार, अंतरवर्तीय खेती तथा ड्रिप एवं स्प्रिंकलर सिंचाई प्रणाली अपनाने की सलाह दी है। लाल मिट्टी वाले क्षेत्रों में 50-60 मिमी तथा काली मिट्टी वाले क्षेत्रों में 60-70 मिमी बारिश होने के बाद ही बुवाई करने की सिफारिश की गई है।
वैज्ञानिकों की सलाह
कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि अभी किसानों को जल्दबाजी में फसल बदलने की आवश्यकता नहीं है। यदि जुलाई के मध्य तक भी पर्याप्त बारिश नहीं होती है, तभी वैकल्पिक फसलों की ओर रुख करना उचित होगा। विशेषज्ञों ने कम पानी में अधिक उत्पादन देने वाली फसलों, अल्प अवधि की किस्मों तथा अंतरफसल प्रणाली को अपनाने पर विशेष जोर दिया है।
कृषि विभाग का मानना है कि वैज्ञानिक पद्धतियों, नमी संरक्षण और उचित फसल चयन के माध्यम से संभावित सूखे के प्रभाव को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
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