कम वर्षा और बेहतर समर्थन मूल्य से बढ़ा रुझान
इस बार एक लाख हेक्टेयर तक पहुंच सकती है रागी की खेती
चित्रदुर्ग। संत कवि पुरंदरदास की पंक्तियां— “रागी तंदीरा भिक्षेगे रागी तंदीरा…”— आज चित्रदुर्ग जिले की बदलती कृषि तस्वीर पर बिल्कुल सटीक बैठती हैं। एल-नीनो के प्रभाव से मानसून कमजोर पडऩे और वर्षा की कमी के बीच जिले के किसान नकदी फसलों से दूरी बनाकर कम पानी में तैयार होने वाली रागी की खेती की ओर तेजी से रुख कर रहे हैं।
मानसून की बेरुखी से किसानों को आर्थिक झटका जरूर लगा है, लेकिन इसके बीच एक सकारात्मक बदलाव यह देखने को मिल रहा है कि पहले जहां मक्का की खेती होती थी, वहां अब रागी का रकबा लगातार बढ़ रहा है। सामान्यत: किसान कपास, मक्का और सूरजमुखी जैसी नकदी फसलों को प्राथमिकता देते थे, लेकिन समय पर बारिश नहीं होने से इनकी बुवाई प्रभावित हुई है। इसका लाभ रागी को मिला है और इस वर्ष जिले में इसका रकबा लगभग एक लाख हेक्टेयर तक पहुंचने की संभावना है।
होसदुर्ग सबसे आगे
रागी उत्पादन के लिए प्रसिद्ध होसदुर्ग तालुक इस बार भी सबसे आगे है। इसके बाद होललकेरे, चित्रदुर्ग और हिरियूर का स्थान है। होसदुर्ग में जहां पहले खरीफ के दौरान मोटे अनाज बोए जाते थे, वहां भी इस बार वर्षा की कमी के कारण रागी की बुवाई बढ़ी है। पिछले वर्ष जिले में 64 हजार हेक्टेयर में रागी की खेती हुई थी, जबकि इस बार 25 से 30 हजार हेक्टेयर अतिरिक्त क्षेत्र में इसकी बुवाई की तैयारी है।
समर्थन मूल्य और रियायती बीज से बढ़ा आकर्षण
रागी की ओर किसानों के झुकाव का एक बड़ा कारण सरकार द्वारा घोषित 5,150 रुपए प्रति क्विंटल का न्यूनतम समर्थन मूल्य भी है। इसके अलावा किसान संपर्क केंद्रों के माध्यम से जीकेवीके द्वारा विकसित तीन माह में तैयार होने वाली रागी किस्म के 5 किलोग्राम बीज पैकेट मात्र 255 रुपए की रियायती दर पर उपलब्ध कराए जा रहे हैं।
यंत्रीकरण से खेती आसान, चारे की चिंता बरकरार
बुवाई से लेकर कटाई तक आधुनिक कृषि यंत्रों के उपयोग से रागी की खेती पहले की तुलना में काफी आसान हो गई है। ट्रैक्टर से बुवाई और मशीनों से कटाई कर अनाज सीधे बोरियों में भरने की सुविधा उपलब्ध है। हालांकि स्थानीय किसान चिदानंदप्पा का कहना है कि मशीनों के बढ़ते उपयोग से पशुओं के लिए मिलने वाले चारे की मात्रा घट रही है, जो भविष्य की चिंता का विषय है।
कम वर्षा वाले चित्रदुर्ग जिले में किसानों का कम पानी वाली फसलों की ओर बढ़ता रुझान न केवल बदलती जलवायु के अनुरूप है, बल्कि कृषि की स्थिरता और खाद्य सुरक्षा की दृष्टि से भी एक महत्वपूर्ण एवं सकारात्मक कदम माना जा रहा है।
रागी केवल 100 दिनों में तैयार हो जाती है
मक्का की तुलना में रागी को कम पानी की आवश्यकता होती है। जहां मक्का तैयार होने में लगभग 120 दिन लगते हैं, वहीं रागी केवल 100 दिनों में तैयार हो जाती है। यह पौष्टिक खाद्यान्न है और भविष्य में इसके विपणन की भी कोई विशेष समस्या नहीं होगी।
–डॉ. मंजुनाथ, संयुक्त निदेशक, कृषि विभाग
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