‘कांतारा’ जैसा भविष्य तो नहीं होगा?केराडी-बेल्लाल।

कस्तूरीरंगन रिपोर्ट की जद में केराडी-बेल्लाल

1,200 परिवारों को खेती और बुनियादी सुविधाओं की चिंता

कुंदापुर (उडुपी)। पश्चिमी घाट की गोद में बसे और फिल्म ‘कांतारा’ से देशभर में पहचान बनाने वाले केराडी और बेल्लाल गांवों के लोगों के मन में अब एक सवाल है—क्या उनका भविष्य भी फिल्म में दिखाए गए संघर्ष जैसा हो जाएगा? कस्तूरीरंगन समिति की रिपोर्ट के दायरे में आने वाले इन गांवों के निवासियों को खेती, सडक़ और अन्य बुनियादी सुविधाओं पर संभावित पाबंदियों की चिंता सता रही है।

जंगल और खेती के बीच बसा जीवन

1990 के दशक में केराडी के आसपास वन अधिकारियों और ग्रामीणों के बीच हुए वास्तविक संघर्षों से प्रेरित होकर ‘कांतारा’ फिल्म की कहानी रची गई थी। फिल्म में दिखाई गई घनी हरियाली, दुर्लभ वन्यजीव और प्राकृतिक सौंदर्य आज भी इस क्षेत्र में मौजूद हैं। इसी जंगल के बीच बड़ी संख्या में परिवार खेती करते हुए पीढिय़ों से रह रहे हैं।

केराडी में करीब 580 और बेल्लाल में 620 परिवार हैं। वर्ष 2011 की जनगणना में दोनों गांवों की आबादी करीब 5,000 थी, जो अब 8,000 से अधिक होने का अनुमान है। एक हजार से अधिक परिवारों की आजीविका मुख्य रूप से सुपारी की खेती पर निर्भर है। इसके अलावा धान, नारियल, काली मिर्च और काजू की भी खेती होती है।

‘खेती और विकास कैसे होगा?’

ग्रामीणों का सवाल है कि यदि रिपोर्ट लागू हुई तो खेती जारी रख पाना कितना संभव होगा। केराडी में सरकारी माध्यमिक विद्यालय की लंबे समय से मांग है। आसपास के गांवों में प्राथमिक विद्यालय हैं, लेकिन माध्यमिक शिक्षा के लिए होसूर या कोडलाडी जाना पड़ता है, जो करीब 7-8 किलोमीटर दूर हैं। पर्याप्त बस सुविधा भी नहीं है।

ग्रामीण अश्वत्थ शेट्टी कहते हैं कि फिलहाल कच्ची सडक़ों की मरम्मत की अनुमति मिल जाती है, लेकिन भविष्य में छोटी-छोटी विकास गतिविधियों के लिए भी क्या अनुमति लेनी पड़ेगी, यही चिंता है।

सडक़, बस और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी

कुंदापुर-बेल्लाल-मोरटु मार्ग पर चलने वाली निजी बस खराब सडक़ के कारण बंद हो चुकी है। अब केवल सरकारी बस सेवा उपलब्ध है। नंद्रोल्ली-बेल्लाल-मारणकट्टे-वंडसे मार्ग पर भी निजी बस की मांग है। उप-स्वास्थ्य केंद्र में नर्स नहीं है और सामुदायिक स्वास्थ्य अधिकारी भी अवकाश पर हैं। केराडी-नडुगट्ट-शाडबेरु और नंद्रोल्ली-हडगुंदी सडक़ों के विकास की मांग भी लंबित है।

गुफा मंदिर भी रिपोर्ट के दायरे में

केराडी का प्राचीन मूडुगल्लु केशवनाथेश्वर गुफा मंदिर भी रिपोर्ट के दायरे में आता है। करीब 50 फुट तक फैली गुफा में प्राकृतिक रूप से स्थापित शिवलिंग, लगातार बहता पानी और विभिन्न प्रकार की मछलियां श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण हैं। बेल्लाल के महालिंगेश्वर और पंजुर्ली दैवस्थान तथा केराडी के वरसिद्धिविनायक सहित कई मंदिर और दैवस्थल भी इस क्षेत्र में हैं।

‘राजस्व और आबादी वाले क्षेत्र बाहर हों’

ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने जंगल और प्रकृति को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया है। वर्षों से वे जंगल के साथ तालमेल बनाकर जीवन जी रहे हैं। उनका आग्रह है कि यदि कस्तूरीरंगन रिपोर्ट लागू करनी ही है तो उसे केवल वन क्षेत्र तक सीमित रखा जाए तथा राजस्व और आबादी वाले क्षेत्रों को इसके दायरे से बाहर रखा जाए।

केराडी के प्रमुख सुदर्शन शेट्टी ने कहा कि छठे मसौदा अधिसूचना के समय ग्राम पंचायत के सभी सदस्यों ने दलगत राजनीति से ऊपर उठकर परिषद चुनाव का बहिष्कार किया था, लेकिन इसका कोई लाभ नहीं हुआ।
ग्रामीण कृष्ण कुल्लंबल्ली ने कहा कि लोगों को रिपोर्ट लागू होने के प्रभावों की सही और स्पष्ट जानकारी पहले देनी चाहिए।

 

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By Bharat Ki Awaz

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