13 साल की उम्र में कोप्पल गविमठ पहुंचे पर्वतय्या
गुरु ने पहचानी प्रतिभा, आज 18वें पीठाधिपति अभिनव गविसिद्धेश्वर स्वामी के हाथों होगा ऐतिहासिक आयोजन का शुभारंभ
कोप्पल। कभी बस छूटने के कारण अनजान जगह पर ठहरने के लिए मठ का दरवाजा खटखटाने वाला 13 वर्षीय बालक आज कर्नाटक के सबसे प्रतिष्ठित सांस्कृतिक पर्व मैसूरु दशहरा के उद्घाटन का गौरव हासिल करने जा रहा है। गरीबी में बीते बचपन से आध्यात्मिक जगत में ऊंचा स्थान बनाने तक की अभिनव गविसिद्धेश्वर स्वामी की यात्रा संघर्ष, संयोग और साधना की प्रेरक कहानी है।
बस छूटी और बदल गई जिंदगी
कलबुर्गी जिले के हागरगुंडगी गांव के नीलय्या हिरेमठ और ईरम्मा के पुत्र पर्वतय्या का बचपन आर्थिक तंगी में बीता। 13 वर्ष की उम्र में उन्हें मुंडरगी जाना था, लेकिन रास्ते में कोप्पल में बस छूट गई। रात गुजारने के लिए वे गविमठ पहुंचे। यही पड़ाव उनके जीवन का निर्णायक मोड़ बन गया।
वे गविमठ में ही रुक गए और मठ के 17वें पीठाधिपति शिवशांतवीर स्वामी के सान्निध्य में शिक्षा के साथ आध्यात्मिक साधना शुरू की। अनुशासन, आचार-विचार और सेवा भावना ने उन्हें गुरु के करीब ला दिया।
गुरु ने पहचानी प्रतिभा, बनाया उत्तराधिकारी
शिवशांतवीर स्वामी ने पर्वतय्या की प्रतिभा और समर्पण को पहचानते हुए वर्ष 1998 में उन्हें अपना उत्तराधिकारी घोषित किया। इसके बाद 13 दिसंबर 2002 को उनका पट्टाभिषेक हुआ और वे कोप्पल गविमठ के 18वें पीठाधिपति अभिनव गविसिद्धेश्वर स्वामी बने।
शिक्षा और सेवा को बनाया साधना का आधार
पीठाधिपति बनने के बाद उन्होंने शिक्षा और समाजसेवा को प्रमुखता दी। उनके नेतृत्व में गविमठ की गतिविधियों का विस्तार हुआ और मठ का वार्षिक मेला इतना व्यापक हुआ कि उसे दक्षिण भारत के ‘कुंभ मेले’ के रूप में पहचान मिलने लगी।
जिस बालक का जीवन एक छूटी हुई बस के कारण मठ की ओर मुड़ा था, उसी अभिनव गविसिद्धेश्वर स्वामी को अब विश्वप्रसिद्ध मैसूरु दशहरा के उद्घाटन का अवसर मिलना कोप्पल के साथ पूरे कर्नाटक के लिए गौरव का क्षण है।
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