16,078 एकड़ में से 10,807 पर ही सरकारी कब्जा, 789 मामले अदालतों में लंबित
अब खाई खोदकर या तारबंदी से जमीन बचाने की तैयारी
चारे के लिए 100 एकड़ में होगी बुवाई
चिक्कमगलूरु। कर्नाटक में सूखे के बीच पशुओं के लिए चारे की व्यवस्था की जा रही है, वहीं चिक्कमगलूरु जिले में अमृत महल चारागाह (कावलु) की हजारों एकड़ जमीन अतिक्रमण की चपेट में है। अधिकारियों ने 5,272 एकड़ जमीन पर कब्जे की पहचान की है, लेकिन अब तक केवल 150 एकड़ ही अतिक्रमणमुक्त कराई जा सकी है। खाली कराई गई जमीन पर दोबारा कब्जा रोकने के लिए अब खाई खोदने और तारबंदी करने की योजना बनाई जा रही है।
16 स्थानों पर फैली हैं चारागाहों की जमीनें
जिले में 16 स्थानों पर अमृत महल चारागाहों की जमीन है। इनमें अज्जमपुर, लिंगदहल्ली, बासूर, बिलुवाल और बीरूर में नस्ल संवर्धन केंद्र संचालित हैं। यहां अमृत महल नस्ल के 800 से अधिक मवेशियों का संरक्षण किया जा रहा है। पशुपालन विभाग को हर साल इस नस्ल के बछड़ों की नीलामी से एक करोड़ रुपए से अधिक की आय होती है।
शेष 11 स्थानों पर नस्ल संवर्धन केंद्र नहीं हैं। पशुओं और पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था के अभाव में इन क्षेत्रों की जमीन पर धीरे-धीरे अतिक्रमण बढ़ता गया।
40 सर्वे नंबरों में 5,272 एकड़ अतिक्रमित
सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार, जिले में 40 सर्वे नंबरों के तहत अमृत महल चारागाहों की कुल 16,078 एकड़ जमीन दर्ज है। इनमें से अधिकारियों के कब्जे में 10,807 एकड़ जमीन ही है। एम्मेदोड्डी सर्वे नंबर में सबसे अधिक अतिक्रमण सामने आया है।
कुल 40 सर्वे नंबरों में से 31 का मापन पूरा हो चुका है। इनमें 21 सर्वे नंबरों की 5,272 एकड़ जमीन पर अतिक्रमण चिह्नित किया गया है। शेष नौ सर्वे नंबरों में चार का मापन जारी है, जबकि पांच का मापन होना बाकी है।
789 मामले अदालतों में लंबित
अमृत महल नस्ल संवर्धन केंद्र के अधिकारियों ने जमीन पर कब्जे के मामलों को लेकर विशेष भूमि कब्जा न्यायालयों में याचिकाएं दायर की हैं। फिलहाल 789 मामले अदालतों में लंबित हैं। अतिक्रमण हटाने के साथ ही खाली कराई गई जमीन को दोबारा कब्जे से बचाना भी अधिकारियों के लिए चुनौती है।
चारे के लिए 100 एकड़ में बुवाई की योजना
सूखे को देखते हुए जिला प्रशासन चारे की उपलब्धता बढ़ाने की तैयारी कर रहा है। पांचों नस्ल संवर्धन केंद्रों में 20-20 एकड़, यानी कुल 100 एकड़ जमीन पर चारा उगाने की कार्ययोजना बनाई गई है।
अधिकारियों के अनुसार, इन केंद्रों में पहले से मवेशी होने के कारण चारे की खेती होती रही है। दूसरी ओर, अन्य चारागाहों की जमीन पर बबूल सहित कई प्रकार के पेड़-पौधे उग आए हैं। ये क्षेत्र कृष्णमृग सहित कई वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास भी हैं।
अधिकारियों का कहना है कि अतिक्रमण हटने के बाद जमीन की सुरक्षा के लिए व्यापक स्तर पर बाड़ लगाने की व्यवस्था की जा सकेगी।
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