25 वर्षों से बुनियादी सुविधाओं का इंतजार
न घर बनाने की अनुमति, न खेती की आजादी, पानी, बिजली और सडक़ के अभाव में विस्थापन की अधूरी कहानी
चिक्कमगलूरु। कर्नाटक के भद्रा टाइगर रिजर्व के घने जंगलों के बीच बसे 35 परिवारों की जिंदगी आज भी बुनियादी सुविधाओं के इंतजार में गुजर रही है। घर बनाने की अनुमति नहीं, खेती करने की आजादी नहीं, बिजली-पानी का इंतजाम नहीं और न ही सडक़ तथा दूरसंचार की सुविधा।
वन संरक्षण के नाम पर पिछले करीब 25 वर्षों से इन परिवारों का जीवन ऐसी परिस्थितियों में गुजर रहा है, जहां विकास की रोशनी अब तक नहीं पहुंच सकी है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि ये परिवार मुख्य रूप से दलित समुदाय से हैं और न तो पूरी तरह जंगल छोड़ पा रहे हैं और न ही वहां सम्मानजनक जीवन जी पा रहे हैं। चिक्कमगलूरु तालुक के मल्लंदूर, मुत्तोडी, शिरवसे और बोगसे गांवों को पार करने के बाद परदेशप्पा मठ का प्रवेश द्वार दिखाई देता है।
प्राकृतिक झरनों पर निर्भर
यहां से दुर्गम पहाड़ी रास्तों और वन विभाग की जांच चौकी को पार कर लगभग छह किलोमीटर जंगल के भीतर पहुंचने पर इन परिवारों की बस्ती मिलती है। यहां वन विभाग की एंटी-पोचिंग टीम का शिविर भी है। बस्ती में कई मकान जर्जर हालत में हैं और कभी भी गिर सकते हैं। पीने के पानी के लिए ग्रामीण पहाड़ी से बहने वाले प्राकृतिक झरनों पर निर्भर हैं।
स्थानीय निवासी बताते हैं कि फरवरी आते-आते झरने सूख जाते हैं। इसके बाद दूसरे नालों और जलस्रोतों की तलाश कर मिट्टी के अस्थायी बांध बनाकर पानी जमा करना पड़ता है। यही पानी ढोकर परिवार अपनी जरूरतें पूरी करते हैं।
ग्रामीण रुद्रय्या के अनुसार, उनके पूर्वजों के नाम पर एक एकड़ कृषि भूमि थी, जिसे भद्रा टाइगर रिजर्व में शामिल कर लिया गया। कुछ परिवारों को तरीकेरे तालुक के एम.सी. हल्ली और चिक्कमगलूरु तालुक के केलगूर के पास जमीन दी गई, लेकिन दस से अधिक परिवार पुनर्वास की सूची से ही बाहर हैं। इस बस्ती से आधा किलोमीटर दूर ऐतिहासिक परदेशप्पा मठ स्थित है।
उचित निर्णय लिया जाएगा
परिवारों की संख्या बढ़ गई है और पुनर्वास पैकेज में संशोधन की मांग उठी है। दीपावली के बाद बैठक आयोजित कर उचित निर्णय लिया जाएगा।
– भंवर सिंह मीणा, जिलाधिकारी
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