जल संरक्षण और भूजल पुनर्भरण का ऐतिहासिक मॉडल
पुनर्जीवन का अध्ययन करने पहुंची केंद्रीय टीम
दूसरे चरण के लिए 10 करोड़ मंजूर
बीदर। करीब 800 साल पुरानी बीदर की करेज जल प्रणाली अब राष्ट्रीय स्तर पर जल संरक्षण के मॉडल के रूप में अध्ययन का विषय बन रही है। जल संचयन, भूजल पुनर्भरण और कम ऊर्जा में पानी के प्रवाह की इस पारंपरिक व्यवस्था के पुनर्जीवन कार्यों का अध्ययन करने के लिए केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय की टीम ने बीदर का दौरा किया।
मंत्रालय के अवर सचिव दीपक कुमार और परियोजना निदेशक साहू के नेतृत्व में पहुंचे अधिकारियों ने करेज प्रणाली की संरचना, ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और हाल में किए गए पुनर्जीवन कार्यों की जानकारी ली। टीम युवा के सह-संस्थापक विनयकुमार मालगे तथा सदस्यों प्रेमकुमार और शंकर ने अधिकारियों को इस पारंपरिक जल व्यवस्था की विशेषताओं से अवगत कराया।
जल संकट से निपटने का मॉडल बन सकती है करेज
दीपक कुमार ने कहा कि बीदर में जल संरक्षण, संचयन और भूजल पुनर्भरण के अनुभव देश के दूसरे जल संकटग्रस्त क्षेत्रों के लिए उपयोगी साबित हो सकते हैं। स्थानीय भौगोलिक परिस्थितियों और पारंपरिक ज्ञान को समझकर उनका आधुनिक योजनाओं में उपयोग किया जाए तो छोटे स्थानीय प्रयास व्यापक अभियान का रूप ले सकते हैं।
परियोजना निदेशक साहू ने कहा कि पुराने समय में स्थानीय लोगों ने क्षेत्र की भौगोलिक परिस्थितियों और पानी की जरूरतों के अनुरूप विशिष्ट जल संरचनाएं विकसित की थीं। इन्हें केवल ऐतिहासिक धरोहर के रूप में देखने के बजाय इनमें छिपे जल प्रबंधन, सामुदायिक भागीदारी और पर्यावरण अनुकूल विकास के ज्ञान को वर्तमान योजनाओं से जोडऩे की जरूरत है।
दूसरे चरण के लिए 10 करोड़ रुपए
टीम युवा के सह-संस्थापक विनयकुमार मालगे ने बीदर की करेज प्रणाली के साथ ऐतिहासिक बावडिय़ों, खुले कुओं, तालाबों और अन्य पारंपरिक जल स्रोतों के पुनर्जीवन के अनुभवों का दस्तावेजीकरण कराने की मांग की। उन्होंने केंद्र से इसे प्रायोगिक अध्ययन के रूप में आगे बढ़ाने का आग्रह किया, ताकि बीदर के मॉडल को जल संकट से जूझ रहे अन्य क्षेत्रों में भी अपनाया जा सके।
मालगे के अनुसार, राज्य सरकार ने करेज प्रणाली के पुनर्जीवन कार्यों के दूसरे चरण के लिए करीब 10 करोड़ रुपए मंजूर किए हैं। इससे संरक्षण और पुनर्जीवन के आगामी कार्यों को व्यवस्थित तरीके से आगे बढ़ाने में मदद मिलेगी।
कम ऊर्जा में पानी पहुंचाने की अनूठी व्यवस्था
करेज पारंपरिक तकनीक पर आधारित भूमिगत जल व्यवस्था है। इसमें स्थानीय भौगोलिक ढलान और भूमिगत संरचनाओं का उपयोग करते हुए पानी का संचयन और प्रवाह किया जाता है। साथ ही वर्षा जल को जमीन के भीतर पहुंचाकर भूजल स्तर बढ़ाने में भी मदद मिलती है। तकनीकी अध्ययन के जरिए इस सदियों पुराने अनुभव को आज के जल संकट के समाधान के लिए उपयोगी मॉडल के रूप में विकसित किया जा सकता है।
इस अवसर पर जिला पंचायत के उप सचिव सूर्यकांत बिरादार, कमलनगर तालुक पंचायत के कार्यकारी अधिकारी हनुमंतराव कावटगे, पंचायत विकास अधिकारी शरत कुमार सहित अन्य अधिकारी मौजूद थे।
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