तालाब सूखे तो कोप्पल से हावेरी तक पलायन
हजारों मवेशियों के लिए चारा-पानी की तलाश में कट रही जिंदगी
हावेरी। तालाबों में पानी नहीं, खेतों में चारा नहीं और मवेशियों के लिए घर के आसपास अब कोई सहारा नहीं। सूखे ने कोप्पल के गोपालकों को घर-बार छोडऩे पर मजबूर कर दिया है। हजारों गायों के रेवड़ों के साथ परिवार कप्पतगुड्डा की पहाडिय़ां और दुर्गम रास्ते पार कर हावेरी पहुंच गए हैं। जहां थोड़ा पानी या हरियाली दिखी, वहीं डेरा डाल दिया।
हावेरी तालुक के अगड़ी, कर्जगी, देवीहोसूर और देवगिरी से लेकर शिग्गावी के बंकापुर, मासनकट्टी, होतनहल्ली तथा हानगल के यल्लूर तक खेतों और झाडिय़ों में अब कोप्पल से आए मवेशियों के झुंड चारा तलाशते दिखाई दे रहे हैं।
सुबह से शाम तक सिर्फ चारे की तलाश
गोपालक परिवारों की रोजमर्रा की जिंदगी अब मवेशियों के पेट और पानी के इंतजाम के इर्द-गिर्द सिमट गई है। कई परिवार 500 से 2,000 तक गायों के रेवड़ संभाल रहे हैं। सुबह 8 से शाम 6 बजे तक खेतों-पहाडिय़ों में चारा तलाशने के बाद खुले में रात गुजारनी पड़ रही है।
चिक्कबेंकल के वेंकप्पा बडलेर कहते हैं कि लिंगदहल्ली का बड़ा तालाब सूख गया तो कप्पतगुड्डा पार कर यहां आना पड़ा।
हमें पैसा नहीं, पशुओं के लिए चारा-पानी चाहिए
गोपालकों की गुहार सीधी है कि मुआवजा नहीं चाहिए, मूक पशुओं के लिए दाना और पानी चाहिए। कृष्णप्पा कहते हैं कि सरकारी सहायता से ज्यादा जरूरी मवेशियों के लिए पेट भर चारा और साफ पानी है।
पम्मण्णा की पीड़ा और गहरी है—इंसान भूख-प्यास बता सकता है, मूक पशु नहीं। उनकी जान बचाने के लिए घर छोडक़र भटकना पड़ रहा है।
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