12 साल में एक बार खिलने वाले दुर्लभ फूल समय से पहले दिखे
वैज्ञानिक कारण अब भी पहेली
कुद्रेमुख (चिक्कमगलूरु)। पश्चिमी घाट की धुंध से ढकी पहाडिय़ों के बीच कुद्रेमुख की शोला घासभूमियां इन दिनों दुर्लभ नीलकुरिंजी के फूलों से सज उठी हैं। सामान्यत: 12 वर्ष में एक बार सामूहिक रूप से खिलने वाला यह फूल इस बार तय समय से करीब चार वर्ष पहले ही दिखाई दिया है। गंगडिकल्लु, चिट्कलगुड्ड और कुद्रेमुख पीक क्षेत्र में पिछले करीब एक महीने से कहीं-कहीं नीलकुरिंजी खिल रही है।
2018 में इसके सामूहिक पुष्पन के बाद अगला व्यापक पुष्पन 2030 में अपेक्षित था। हालांकि इस बार समय से पहले फूल खिलने का सटीक वैज्ञानिक कारण अभी स्पष्ट नहीं हुआ है। वनस्पतिशास्त्रियों के अनुसार, उपलब्ध जानकारी के आधार पर इसे सीधे जलवायु परिवर्तन से जोडऩा उचित नहीं होगा। स्थानीय पौध समुदाय में पुष्पन का चक्र अलग-अलग होने या मुख्य पुष्पन के बीच सीमित फूल आने की संभावना भी जताई गई है।
परागण जीवों के लिए भी अहम
नीलकुरिंजी का शोला घासभूमि पारिस्थितिकी तंत्र में महत्वपूर्ण स्थान है। इसके फूल मधुमक्खियों, तितलियों और अन्य परागण जीवों के लिए भोजन और पराग का स्रोत बनते हैं। भारत में स्ट्रोबिलैंथस वंश की 160 से अधिक प्रजातियां पाई जाती हैं, जिनमें 72 प्रजातियां पश्चिमी घाट तक सीमित हैं।
नीलकुरिंजी का जीवनचक्र भी अनूठा है। यह करीब 11-12 वर्षों तक ऊर्जा संचित करने के बाद फूलती है और बीज बनने के साथ अपना जीवनचक्र पूरा करती है।
एमजीएम कॉलेज की वनस्पति विज्ञान विभागाध्यक्ष श्रुति नायक ने बताया कि 2026 में सीमित स्तर पर पुष्पन होना इस स्थानीय पौध समुदाय के पुष्पन चक्र में विविधता का संकेत हो सकता है।
फूलों के साथ न हो खिलवाड़
दुर्लभ फूलों को देखने के लिए कुद्रेमुख पहुंच रहे पर्यटकों और ट्रेकर्स की संख्या बढ़ी है। फूल तोडऩे, पौधों पर पैर रखने और प्लास्टिक फेंकने से इनके संरक्षण पर खतरा पैदा हो सकता है। फूलों को छूने या तोडऩे तथा पौधों को नुकसान पहुंचाने पर रोक है और विभाग लगातार निगरानी कर रहा है।
–रुथ्रेन, डीएफओ, कुद्रेमुख वन्यजीव विभाग
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