खिलाने वाले पर 1 लाख रुपए जुर्माना, शामिल होने वालों पर भी 50 हजार रुपए का दंड
सूखे और महंगाई के बीच फिजूलखर्ची रोकने ग्रामीणों का सामूहिक फैसला
शिवमोग्गा। सूखे और आर्थिक संकट के बीच शादी के बाद होने वाले भव्य रिसेप्शन पर शिवमोग्गा जिले के हरगी गांव में रोक लगा दी गई है। ग्रामीणों ने सामूहिक रूप से फैसला किया है कि अब गांव में शादी के बाद बड़े पैमाने पर दावत आयोजित नहीं की जाएगी। नियम तोडक़र रिसेप्शन आयोजित करने वाले परिवार पर 1 लाख रुपए और इसमें शामिल होने वाले व्यक्ति पर 50 हजार रुपए का जुर्माना लगाया जाएगा।
हरगी गांव में 350 से अधिक परिवार हैं। इनमें अधिकांश दीवर (ईडिगा) समुदाय से हैं। मलेनाडु क्षेत्र में शादी के बाद रिश्तेदारों, दोस्तों और ग्रामीणों को बुलाकर बड़े पैमाने पर दावत कराने की परंपरा रही है। आर्थिक रूप से सक्षम परिवार पांच से दस तक भेड़ लाकर दावत कराते हैं, जबकि मध्यम वर्गीय परिवार भी दो-तीन भेड़ खरीदकर भोजन का आयोजन करते हैं।
प्रतिष्ठा की होड़ बनी आर्थिक बोझ
ग्रामीणों के अनुसार, उन्होंने इतना खर्च किया, हम कम कैसे करें की मानसिकता ने शादी के बाद के रिसेप्शन को दिखावे की होड़ में बदल दिया है। गरीब और छोटे किसान परिवार कई बार शादी के बाद दावत के लिए कर्ज लेकर भेड़ खरीदते हैं। इसके बाद कर्ज चुकाने का बोझ परिवार पर पड़ता है। सूखे के कारण कृषि आय प्रभावित होने से यह आर्थिक दबाव और बढ़ गया है।
करीब 30 वर्ष पहले शादी के बाद रिश्तेदारों के लिए साधारण भोजन कराया जाता था। उस समय 10-15 लोगों को सीमित खर्च में भोजन कराया जाता था। अब शमियाना, टेबल, राशन और खाना बनाने वालों सहित 8 से 15 लाख रुपए तक खर्च होने की बात ग्रामीणों ने कही। बड़े आयोजनों में एक हजार से अधिक लोग शामिल होते हैं। मध्यम वर्गीय परिवारों का खर्च करीब 4 से 6 लाख और गरीब परिवारों का न्यूनतम 2 लाख रुपए तक पहुंचने का दावा किया गया है।
बेटी वालों का बोझ घटाने की पहल
ग्रामीणों का कहना है कि शादी के आयोजन में पहले ही बड़ी रकम खर्च होती है। इसके बाद सामाजिक प्रतिष्ठा के दबाव में रिसेप्शन आयोजित करना बेटी के परिवार पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ डालता है। ऐसे में सूखे के समय परंपरा और दिखावे के बजाय आर्थिक अनुशासन जरूरी है।
दूसरे गांवों के लिए भी उदाहरण बनेगा फैसला
पिछले कुछ वर्षों में शादी के बाद बड़े रिसेप्शन की परंपरा बढ़ी है और इससे पिछड़े वर्ग के परिवारों पर आर्थिक बोझ बढ़ रहा है। इसी कारण ग्रामीणों ने सामूहिक निर्णय लिया है। यह फैसला दूसरे गांवों के लिए भी उदाहरण बनेगा।
-षण्मुखप्पा कोडिहल्ली, उपाध्यक्ष, हरगी स्वयं सहायता समूह
आर्थिक बोझ कम होगा
प्रतिष्ठा के लिए पांच या दस भेड़ लाकर दावत कराने की प्रतिस्पर्धा अनावश्यक है। ऐसे आयोजनों पर रोक लगाने से परिवारों का आर्थिक बोझ कम होगा।
–प्रकाश मुडुब सिद्दापुर, अध्यक्ष, तालुक आर्य ईडिगा समाज, शिकारीपुर
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