9,652 से 15,511 करोड़ की बेड़ती-हिरेवडट्टी परियोजना पर विरोध तेज
10 अक्टूबर को बेंगलूरु में आंदोलन
524 मिलियन घन मीटर पानी मोडऩे का प्रस्ताव
विरोधियों का दावा—वन क्षेत्र और पश्चिमी घाट की जैव विविधता पर पड़ेगा असर
कारवार। उत्तर कन्नड़ में गर्मियों के दौरान स्थानीय जल जरूरतें पूरी करना चुनौती बना रहता है। ऐसे में जिले की नदियों का पानी हजारों करोड़ रुपए खर्च कर दूसरे इलाके में ले जाने की बेड़ती-हिरेवडट्टी नदी जोड़ो परियोजना ने विरोध के साथ बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। परियोजना की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) तैयार करने की प्रक्रिया आगे बढ़ रही है और ड्रोन सर्वे की तैयारी है। इसके विरोध में 10 अक्टूबर को बेंगलूरु के फ्रीडम पार्क में आंदोलन की तैयारी है।
15,511 करोड़ तक लागत
राष्ट्रीय जल विकास अभिकरण की रिपोर्ट के अनुसार बेड़ती का 524 मिलियन घन मीटर पानी उत्तर कर्नाटक ले जाने के दो विकल्प प्रस्तावित हैं। पहले विकल्प में सुरंग और नहरों के जरिए पानी तुंगभद्रा जलाशय और वहां से हिरेवडट्टी जलाशय तक पहुंचाने की योजना है। 2025 की संभाव्यता रिपोर्ट में इसकी लागत 15,511 करोड़ रुपए और सिंचाई क्षेत्र 67,819 हेक्टेयर बताया गया है।
दूसरे विकल्प में पाइपलाइन से पानी सीधे हिरेवडट्टी जलाशय तक पहुंचाने का प्रस्ताव है। इसकी लागत 9,652 करोड़ रुपए और सिंचाई क्षेत्र 70,035 हेक्टेयर बताया गया है।
पानी पहुंचाने का खर्च भी भारी
रिपोर्ट के अनुसार पानी को ऊंचाई और दूरी के कारण पंप करना होगा। बिजली, पाइपलाइन और रखरखाव समेत वार्षिक संचालन खर्च 1,500 से 2,100 करोड़ रुपए तक होने का अनुमान है। वहीं वार्षिक लाभ 2,101 से 2,122 करोड़ रुपए बताया गया है। यानी अनुमानित खर्च और लाभ के बीच अंतर बेहद कम है।
परियोजना में बेड़ती की सहायक नदियों शाल्मला और पट्टणदहल्ला के पानी को भी मोडऩे का प्रस्ताव है। सरेळेबैल और हुलगोल के पास बैराज तथा यल्लापुर तालुक के सूरिमने में बेड़ती पर बांध बनाने की योजना बताई गई है।
समुद्र में जाना पानी की बर्बादी नहीं
परियोजना का विरोध कर रहे विशेषज्ञों का कहना है कि नदी का समुद्र में मिलना पानी की बर्बादी नहीं है। समुद्री वैज्ञानिक डॉ. वी.एन. नायक के अनुसार नदी अपने साथ खनिज, लवण और पोषक तत्व समुद्र तक पहुंचाती है। मुहाना क्षेत्र समुद्री जीवों के प्रजनन और पोषण के लिए महत्वपूर्ण है।
समुद्र विज्ञानी डॉ. प्रकाश मेस्ता के अनुसार नदी का मीठा पानी कम होने से मुहाने में खारे पानी का प्रभाव बढ़ सकता है, जिससे मछलियों और अन्य जलीय जीवों पर असर पड़ेगा।
तट की अपनी जरूरत
विरोधियों का कहना है कि कारवार-अंकोला क्षेत्र में गर्मियों में जलापूर्ति पहले से चुनौती है। कदंबा नौसैनिक अड्डे सहित कई बड़ी परियोजनाएं नदियों पर निर्भर हैं। गंगावली नदी से नौसैनिक अड्डे को प्रतिदिन करीब 120 एमएलडी पानी दिए जाने की बात सामने आई है। भविष्य की औद्योगिक और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं से पानी की मांग बढऩे की आशंका भी है।
पश्चिमी घाट पर खतरे की चिंता
विरोधियों का दावा है कि परियोजना से 100 से 823 हेक्टेयर वन क्षेत्र प्रभावित हो सकता है। सुरंग, नहर और पाइपलाइन निर्माण से पश्चिमी घाट की पहाड़ी ढलानों, वन्यजीव आवास, भूजल, कृषि और पर्यटन पर असर पडऩे की आशंका जताई गई है। तटीय मत्स्य संसाधनों और पश्चिमी घाट की फसलों पर भी संभावित प्रभाव को लेकर चिंता है।
बेड़ती के अलावा अघनाशिनी और काली नदियों के पानी को भी दूसरे क्षेत्रों की ओर ले जाने के प्रस्तावों का स्थानीय स्तर पर विरोध हुआ है। सोन्दा स्वर्णवल्ली मठ के गंगाधरेंद्र सरस्वती स्वामी ने नदी जोड़ो योजनाओं के संभावित प्रभाव को लेकर व्यापक आंदोलन की अपील की है।
बड़ा सवाल यही ह कि जिस उत्तर कन्नड़ में गर्मियों में स्थानीय पानी की जरूरत पूरी करना चुनौती है, उसकी नदियों का पानी हजारों करोड़ खर्च कर दूसरे इलाके में ले जाने से पहले स्थानीय जल सुरक्षा और पर्यावरणीय कीमत का आकलन कैसे होगा?
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