जिस आवाज से गांव जागता था, वह अब हमेशा के लिए खामोश हैखेतों में दिखी लोमडिय़ां।

बागीचों और खेतों में दौड़ती लोमडिय़ां अब सिर्फ यादों में

बदलती खेती, रसायनों और सोलर बाड़ ने छीनी वन्यजीवों की जगह

विजयनगर। सुबह के चार बजे का वक्त था। गांव अभी गहरी नींद में डूबा रहता था। ठंडी हवा के बीच अचानक अंधेरे को चीरती आवाज आती—‘व्वो… व्वोव… व़्होव्वव़्हो…।’ यह किसी घड़ी का अलार्म नहीं, खेतों के बीच घूमती लोमडिय़ों की पुकार थी। आवाज सुनते ही घर के बुजुर्ग बच्चों को जगाते—सवेरा हो गया, उठो, लोमड़ी बोल रही है।

विजयनगर जिले के हगरिबोम्मनहल्ली तालुक के बाचिगोंडनहल्ली में कभी यह रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा था। खेतों की मेड़, गन्ने के खेत, मक्का की फसल और गांव के बाहर छोटी-छोटी पत्थरीली पहाडिय़ों की गुफाएं—हर जगह लोमडिय़ों की मौजूदगी महसूस होती थी। लेकिन अब वही गांव है, वही खेत हैं और वही पहाड़ी भी, बस लोमडिय़ां नहीं हैं।

खेतों में दौड़ती थीं, गांव की कहानियों में भी रहती थीं

बचपन की यादों में लोमडिय़ों की आवाज के साथ उनकी कहानियां भी थीं। स्कूल में शिक्षक लोमड़ी की चालाकी के किस्से सुनाते। दोस्त भी मजाक करते कि आज सुबह लोमड़ी का मुंह देखकर आया लगता है।

शाम को पिता के साथ खेत जाने पर कभी गन्ने के खेत से तो कभी मक्के की मेड़ से लोमड़ी अचानक छलांग लगाकर भागती दिख जाती। उसकी लहराती पूंछ और तेज दौड़ बच्चों के लिए किसी रोमांच से कम नहीं थी।

लोमडिय़ां फसल का थोड़ा हिस्सा खा जाती थीं। फिर भी किसान उन्हें केवल नुकसान मानकर नहीं देखते थे। गांव के बुजुर्गों की कही एक बात आज भी याद आती है। किसान तीन हिस्सों में बोता है। एक हिस्सा पशु-पक्षियों का, दूसरा गरीबों का और तीसरा किसान का। यह सिर्फ कहावत नहीं थी। उस समय खेती में मनुष्य के साथ पशु-पक्षियों के हिस्से की भी जगह थी।

मक्का कटा तो बेघर हो गए बच्चे

फसल कटने के दिनों में लोमडिय़ों के सामने मुश्किल जरूर आती थी। वे खेतों में ही अपने बच्चों को छिपाकर रखती थीं। एक बार मक्का कटने के बाद पूरा खेत खाली हो गया। लोमड़ी ने अपने बच्चों को घास के ढेर में छिपा रखा था।

बच्चों के मिलने की खबर पूरे गांव में फैल गई। लोग उन्हें देखने के लिए ऐसे पहुंचने लगे जैसे अस्पताल में नवजात बच्चे को देखने रिश्तेदार आते हैं। तब लोमड़ी सिर्फ जंगल का जीव नहीं थी, वह गांव के जीवन का हिस्सा थी।

कपलप्पन की पहाड़ी अब सूनी है

गांव के बाहर स्थित ‘कपलप्पन गुड्डा’ पहाड़ी लोमडिय़ों का पसंदीदा ठिकाना था। जनवरी-फरवरी में पहाड़ी पर उनका खेलना लोगों के लिए आकर्षण होता। बुजुर्ग बताते थे कि कपलप्पा और कपलटुग जैसे नाम भी स्थानीय लोकजीवन में लोमडिय़ों के लिए इस्तेमाल होते थे।

पहाड़ी पर मौजूद प्राकृतिक चिकनी चट्टान भी लोमडिय़ों की गतिविधियों से जुड़ी लोककथा का हिस्सा थी। माना जाता था कि चट्टान से शरीर रगड़ते हुए दौडऩे के कारण वह चिकनी हो गई। आज उसी कपलप्पन गुड्डा पर लोमडिय़ों के पदचिह्न तक नहीं मिलते। बची हैं तो सिर्फ कहानियां।

खेती बदली तो बदल गया पूरा पारिस्थितिकी तंत्र

गांव के बुजुर्ग किसानों के अनुसार लोमडिय़ों के गायब होने के पीछे खेती में आया बदलाव भी बड़ा कारण है। पहले गन्ना, मक्का, बाजरा, मूंगफली, खीरा, मूली और गाजर जैसी पारंपरिक फसलें होती थीं। लोमडिय़ां इनमें से थोड़ा बहुत खाती थीं और किसान इसे खेती का स्वाभाविक हिस्सा मानते थे।

अब खेती का स्वरूप बदल गया है। पारंपरिक फसलों की जगह व्यावसायिक खेती ने ले ली है। रासायनिक पदार्थों का इस्तेमाल बढ़ा है। खेतों के चारों ओर सोलर बाड़ लग गई हैं। खेत और जीव-जंतुओं के बीच पहले मौजूद खुली जगह लगातार सिकुड़ती गई। पहले किसान के मन में हमारा हिस्सा के साथ उनका हिस्सा भी था। अब खेत का हर इंच उत्पादन और मुनाफे की गणना में शामिल है।

कहीं देर तो नहीं हो गई

कभी-कभार किसी लोमड़ी को पालने की घटनाएं भी हुईं। मां से बिछड़े एक बच्चे को किसान घर ले आए और कुतिया का दूध पिलाकर पाला। बड़ा होने पर उसने आसपास के घरों की मुर्गियां उठानी शुरू कर दीं। गांव के बाहर लोमडिय़ों की आवाज सुनाई देती तो वह भी उसी सुर में बोलने लगता। आखिरकार उसे दूसरे गांव में छोडऩा पड़ा।

पागल लोमडिय़ों के खेतों में काम करने वाले लोगों पर हमले भी हुए। आत्मरक्षा में किसानों ने उन्हें मारा भी। तब लोमडिय़ों से परेशानी थी। लेकिन आज सवाल उलटा है कि परेशानी यह नहीं कि लोमडिय़ां हमला क्यों कर रही हैं, बल्कि यह है कि वे दिखाई ही क्यों नहीं दे रहीं।

बाचिगोंडनहल्ली की सुबह अब शांत है। खेतों की मेड़ें हैं, पहाड़ी है, फसलें हैं, लेकिन वह आवाज नहीं है जो कभी पूरे गांव का जैविक अलार्म हुआ करती थी। हम जाग चुके हैं। लेकिन क्या प्रकृति में अपने आसपास से गायब होते जीवों को पहचानने में हम देर कर रहे हैं। कपलप्पन गुड्डा की खाली पहाड़ी आज भी शायद यही सवाल पूछ रही है।

 

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By Bharat Ki Awaz

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