बंदरों के आतंक से पकती धान की फसल पर संकटबंदरों का आतंक।

झुंड में खेतों में घुसकर फसल नष्ट कर रहे बंदर; स्थायी समाधान के लिए ‘मंकी पार्क’ की मांग

कुंदापुर (उडुपी)। बारिश की अनिश्चितता के बावजूद खरीफ धान की खेती करने वाले किसानों के सामने अब बंदरों का आतंक नई परेशानी बन गया है। झुंड में खेतों में घुस रहे बंदर धान के पौधों को रौंदने के साथ बालियां खाकर फसल को नुकसान पहुंचा रहे हैं। इससे किसानों को आर्थिक नुकसान का सामना करना पड़ रहा है।

कई उपाय बेअसर

बंदरों को भगाने के लिए किसान तेज आवाज वाले उपकरण, पटाखे, ढोल बजाने, खेतों की मेड़ पर प्रकाश परावर्तित करने वाली पट्टियां लगाने और बंदरों के पुतले टांगने जैसे कई उपाय कर रहे हैं। लेकिन कुछ ही दिनों में बंदर इन उपायों के अभ्यस्त हो जाते हैं और फिर खेतों में पहुंच जाते हैं।

फसल पकने के समय बंदरों के झुंड के हमले से किसानों की चिंता बढ़ गई है। एक बार खेत में घुसने के बाद बंदर घंटों तक वहीं रहकर धान की बालियां खाते हैं, जिससे फसल बचाना किसानों के लिए चुनौती बन गया है।

किसानों की सुरक्षा भी चिंता का विषय

दो दिन पहले हलाड़ी में बाग में घुसे जंगली जानवर को भगाने गए एक किसान की मौत की घटना से ग्रामीण क्षेत्रों में चिंता बढ़ गई है। ऐसे में फसल के समय वन्यजीवों के खेतों और बागों में पहुंचने से किसानों के सामने जान-माल की सुरक्षा का भी सवाल खड़ा हो गया है।

घाट और वन क्षेत्र से सटे इस इलाके में बंदरों को पकडक़र लाकर अन्य स्थानों पर छोडऩे की प्रवृत्ति से समस्या और बढऩे का आरोप भी लगाया जा रहा है। बंदरों की संख्या बढऩे से धान के अलावा बागों में लगी सब्जियों और फलों को भी नुकसान पहुंच रहा है।

मुआवजा भी नहीं मिलने से नाराजगी

किसानों का कहना है कि बंदरों से होने वाले फसल नुकसान का उचित मुआवजा नहीं मिल रहा है। फसल बचाने के लिए उन्हें खेतों के किनारे अस्थायी रूप से रहने तक की मजबूरी है। लगातार हो रहे नुकसान से किसानों की आर्थिक स्थिति प्रभावित हो रही है।

किसान नेता हरिप्रसाद शेट्टी ने बंदरों की समस्या के स्थायी समाधान के लिए वैज्ञानिक और दीर्घकालीन योजना बनाने तथा बंदरों के संरक्षण और प्रबंधन के लिए उपयुक्त स्थान पर ‘मंकी पार्क’ स्थापित करने की मांग की।

बंदर आबादी की ओर क्यों आ रहे हैं?

वन क्षेत्रों में भोजन और पानी की उपलब्धता कम होना बंदरों के आबादी वाले क्षेत्रों में आने का एक कारण माना जा रहा है। इसके अलावा धान, फल और सब्जियां आसानी से उपलब्ध होने के कारण खेत भी उन्हें आकर्षित कर रहे हैं। कुछ क्षेत्रों में बंदरों को पकडक़र दूसरे स्थानों पर छोडऩे की शिकायतें भी सामने आ रही हैं।

स्थायी समाधान जरूरी

बंदरों का झुंड एक बार धान के खेत में घुस जाए तो फसल बचाना बेहद मुश्किल हो जाता है। पौधों को नष्ट करने के साथ वे दाने भी खा जाते हैं। बंदरों की संख्या नियंत्रित करने के लिए स्थायी समाधान जरूरी है।
बलाडी संतोष शेट्टी अंपारु, किसान

किसानों के सामने आर्थिक और सामाजिक चुनौती

बंदरों का आतंक केवल खेतों तक सीमित नहीं है। वे बागों में लगी सब्जियों और फलों को भी नष्ट कर रहे हैं। धान की फसल बचाने के लिए खेत के किनारे झोपड़ी बनाकर रहने की मजबूरी है। लगातार फसल नुकसान किसानों के सामने आर्थिक और सामाजिक चुनौती बन गया है।
बालचंद्र कुलाल यडमोगे, किसान

 

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By Bharat Ki Awaz

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