लम्बाणी कढ़ाई को नई पहचान दिलाने वाली सुशीलानगर की उमाबाई नायक राष्ट्रीय हस्तशिल्प पुरस्कार-2025 से सम्मानित
संडूर (बल्लारी)। प्रतिभा किसी शैक्षणिक डिग्री की मोहताज नहीं होती। संडूर तालुक के सुशीलानगर की लम्बाणी महिला उमाबाई नायक ने अपनी पारंपरिक कढ़ाई कला के दम पर इसे साबित कर दिखाया है। महज नौवीं कक्षा तक पढ़ी उमाबाई को वर्ष 2025 का राष्ट्रीय हस्तशिल्प पुरस्कार प्रदान किया गया है। हम्पी के हजारराम मंदिर परिसर स्थित ओड्डोलगम की कलाकृति को शीशे और रंग-बिरंगे धागों से जीवंत रूप देने के लिए उन्हें यह सम्मान मिला है। केंद्रीय वस्त्र मंत्रालय ने उनके पारंपरिक शिल्प कौशल की सराहना की है।
चाची से मिली प्रेरणा, हुनर बना पहचान
उमाबाई को बचपन से ही लम्बाणी कढ़ाई में रुचि थी। वर्ष 2000 में इसी कला के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त करने वाली उनकी चाची शांतिबाई ने उन्हें प्रेरित किया। वर्ष 2011 में उन्होंने संडूर स्थित कुशल कला केंद्र में गुरु-शिष्य परंपरा के तहत प्रशिक्षण लिया।
150 से अधिक कारीगरों को दे रहीं दिशा
पिछले 15 वर्षों से अधिक समय से कुशल कला केंद्र से जुड़ी उमाबाई वर्तमान में उत्पादन पर्यवेक्षक हैं। वे विभिन्न गांवों के 150 से अधिक कारीगरों के नेटवर्क का समन्वय करने के साथ प्रशिक्षण और उत्पादों की गुणवत्ता बनाए रखने की जिम्मेदारी निभा रही हैं। वर्ष 2023 में हम्पी में आयोजित जी-20 शिखर सम्मेलन के दौरान भी उनके हस्तशिल्प कौशल को प्रदर्शित करने का अवसर मिला था।
गांव की परंपरा को राष्ट्रीय पहचान
लम्बाणी कढ़ाई के लिए प्रसिद्ध सुशीलानगर की महिलाओं ने इस पारंपरिक कला को पीढिय़ों से सहेजा है। उमाबाई की चाची शांतिबाई को राष्ट्रीय और राज्योत्सव पुरस्कार मिल चुका है। गांव की भाग्यबाई ने स्वयं सहायता समूह के माध्यम से कारीगरों को संगठित करने में योगदान दिया है। उमाबाई ने अपनी सफलता का श्रेय चाची के मार्गदर्शन, पति वेंकटेश नायक, बेटे दीपक कुमार और कुशल कला केंद्र के अधिकारियों के सहयोग को दिया। उनका प्रयास नई पीढ़ी की महिलाओं को भी इस पारंपरिक कला से जोडऩा है।
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