कर्नाटक में चीनी मिलों के पहिए थमे, गन्ना किसानों की बढ़ी चिंता

मूल्य विवाद से पेराई सत्र में देरी

दक्षिण कर्नाटक की केवल आठ मिलों में काम शुरू, उत्तर कर्नाटक की मिलें अब भी बंद

सूखे से पैदावार में 30 प्रतिशत तक गिरावट की आशंका

कटाई में देरी से गन्ने का वजन और चीनी की रिकवरी घटने का खतरा

बेलगावी। कर्नाटक में गन्ने के मूल्य को लेकर किसानों और सरकार के बीच जारी गतिरोध का असर चीनी पेराई सत्र पर पडऩे लगा है। आमतौर पर 20 अक्टूबर से 15 नवंबर के बीच पेराई शुरू करने वाली मिलों में इस बार कामकाज पिछड़ गया है।

दक्षिण कर्नाटक की केवल आठ मिलों में पेराई शुरू हुई है, जबकि उत्तर कर्नाटक की कई मिलों में मशीनों की पूजा के बावजूद उत्पादन शुरू नहीं हो पाया है। दूसरी ओर, सूखे और सिंचाई के लिए पर्याप्त पानी नहीं मिलने से गन्ने की पैदावार में करीब 30 प्रतिशत तक गिरावट की आशंका है। ऐसे में देरी किसानों की मुश्किलें और बढ़ा सकती है।

रकबा बढ़ा, उत्पादन पर संकट

वर्ष 2025-26 में राज्य में 630 लाख टन गन्ने का उत्पादन हुआ था। इसमें से गुड़ निर्माण, बीज और दूसरे राज्यों में भेजे गए गन्ने को अलग करने के बाद 81 चीनी मिलों में 576 लाख टन गन्ने की पेराई हुई थी। इससे 49.63 लाख टन चीनी का उत्पादन हुआ था।

इस वर्ष गन्ने का रकबा बढक़र 7.33 लाख हेक्टेयर हो गया है, लेकिन पानी की कमी से पैदावार प्रभावित होने की आशंका है। बेलगावी स्थित एस. निजलिंगप्पा शुगर इंस्टीट्यूट के तकनीकी सलाहकार चिदानंद पाटील के अनुसार, सामान्य परिस्थितियों में प्रति एकड़ 50 से 60 टन गन्ना पैदा होता है। इस बार यह घटकर 30 से 35 टन रह सकता है। इससे मिलों को गन्ने की उपलब्धता और चीनी उत्पादन, दोनों पर असर पडऩे की आशंका है।

हर दस दिन में सिंचाई जरूरी, पर पानी का संकट

पाटील ने बताया कि तेज धूप के कारण बारिश के मौसम में भी गन्ने को कम से कम हर दस दिन में पानी देना जरूरी है। लेकिन पर्याप्त पानी नहीं मिलने और सिंचाई पंपों के लिए नियमित बिजली आपूर्ति की कमी से किसान परेशान हैं।

पानी के अभाव में गन्ने की गांठें छोटी रह गई हैं। समय पर कटाई नहीं होने से फसल का वजन और चीनी की रिकवरी घट सकती है। अधिक देरी होने पर गन्ना सूखने का खतरा भी बढ़ जाएगा।

तैयार फसल लेकर मिलों के इंतजार में किसान

बैलहोंगल तालुक के मत्तिकोप्पा स्थित केएलई-भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद कृषि विज्ञान केंद्र के प्रमुख मंजुनाथ चौरड्डी के अनुसार, गन्ने की किस्म के आधार पर फसल नौ से 11 महीने, 12 से 13 महीने या 14 से 16 महीने में कटाई के लिए तैयार होती है। कई क्षेत्रों में फसल कटाई की अवस्था में पहुंच चुकी है, लेकिन मिलें शुरू नहीं होने से किसानों को इंतजार करना पड़ रहा है।

बडली गांव के किसान अशोक खनगावी ने बताया कि उन्होंने दस एकड़ में गन्ना लगाया है, जिसमें से पांच एकड़ की फसल कटाई के लिए तैयार है। एक सप्ताह के भीतर कटाई नहीं हुई तो गन्ने का वजन घटने की आशंका है। नदी किनारे के गांवों में किसानों को अपेक्षाकृत कम परेशानी है, लेकिन नहरों और बोरवेल पर निर्भर किसान फसल बचाने के लिए जूझ रहे हैं।

मूल्य विवाद सुलझाने की मांग

पेराई में देरी से किसानों को दोहरी मार झेलनी पड़ सकती है। एक ओर सूखे से पैदावार घटने का खतरा है, तो दूसरी ओर तैयार फसल खेतों में खड़ी है। ऐसे में गन्ने के मूल्य को लेकर जारी गतिरोध दूर कर मिलों में जल्द पेराई शुरू करना जरूरी है, ताकि किसानों को होने वाले नुकसान और गन्ने के वजन व चीनी की रिकवरी में संभावित गिरावट को कम किया जा सके।

 

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By Bharat Ki Awaz

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