उत्तर कन्नड़ में बढ़ते ‘डेड विलेज’ से चिंता
कहीं पलायन तो कहीं अंधविश्वास के कारण गांव छोडऩे का दावा
कारवार (उत्तर कन्नड़)। कभी बच्चों की किलकारियों, युवाओं की चहल-पहल, बुजुर्गों की बातचीत और मवेशियों की आवाजों से गुलजार रहने वाले उत्तर कन्नड़ के कई गांव अब वीरान हो चुके हैं। जिला पंचायत के सर्वेक्षण में करीब 40 गांवों में आबादी शून्य होने की जानकारी सामने आने के बाद ग्रामीण पलायन का गंभीर सवाल खड़ा हो गया है। इन गांवों में घर हैं, लेकिन उनमें रहने वाले लोग नहीं हैं।
कहां गए गांव के लोग
इन गांवों के खाली होने के पीछे अलग-अलग कारण सामने आ रहे हैं। कहीं रोजगार और बुनियादी सुविधाओं के अभाव में लोगों के शहरों की ओर जाने की बात कही जा रही है तो कहीं सूखे के कारण पलायन का दावा है। कुछ गांवों के संबंध में स्थानीय लोगों ने अंधविश्वास के कारण परिवारों के गांव छोडऩे की जानकारी दी है। हालांकि, इन कारणों की वास्तविकता और प्रत्येक गांव की स्थिति की आधिकारिक स्तर पर विस्तृत जांच जरूरी है।
जोयडा से मुंडगोड तक वीरानी
जिले के जोयडा, दांडेली, हलियाल और मुंडगोड तालुकों में खाली गांवों की संख्या अधिक बताई जा रही है। जोयडा तालुक के बाडगुंद में करीब 15 परिवारों के अंधविश्वास के कारण गांव छोडऩे की बात कही जा रही है।
हलियाल तालुक के चेन्नापुर, बबलीकोप्पा, हरवल्ली, माविनकोप्पा, बेगूर, मंडकी, विंचोल्ली, चिमनल्ली, मालवाड, मलवडी, माचापुर, चिनगिनकोप्पा, अंबडग और अटले जैसे गांवों से लोगों के बेहतर सुविधाओं और रोजगार की तलाश में शहरों की ओर जाने की जानकारी सामने आई है।
मुंडगोड तालुक के बंकासाली, बेचारक, इंगलिकी और हुडेलकोप्पा में भी सूखे और रोजगार संकट के कारण पलायन की बात कही जा रही है। कुछ परिवार छह महीने शहरों में काम करने के बाद बारिश के मौसम में गांव लौटते हैं।
गांव खाली होना सिर्फ पलायन नहीं, चेतावनी है
किसी गांव से आबादी का पूरी तरह खत्म हो जाना केवल जनसंख्या का आंकड़ा नहीं है। इसके पीछे रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, सडक़, पेयजल, सिंचाई और अन्य बुनियादी सुविधाओं से जुड़े सवाल भी छिपे हैं। यदि ग्रामीणों को स्थायी आजीविका और जरूरी सुविधाएं गांव में नहीं मिलेंगी तो पलायन का सिलसिला जारी रह सकता है।
सरकार को प्रत्येक खाली गांव का अलग-अलग सर्वेक्षण कर वास्तविक कारण दर्ज करने, पलायन करने वाले परिवारों की स्थिति जानने और रोजगार व बुनियादी सुविधाओं के लिए ठोस योजना बनाने की जरूरत है। क्योंकि सवाल सिर्फ यह नहीं कि 40 गांव खाली क्यों हुए। असली सवाल यह है कि अगर समय रहते कारण नहीं खोजे गए तो आने वाले वर्षों में ऐसे गांवों की संख्या कितनी बढ़ेगी।
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