23 साल से एक भी भाषा नहीं जुड़ी
2003 में चार भाषाओं के बाद प्रक्रिया ठप
मांग वाली भाषाओं की संख्या 35 से बढक़र 99 हुई
तुलु के लिए बड़े स्तर के प्रयास की जरूरत
मेंगलूरु (दक्षिण कन्नड़)। कर्नाटक सरकार की ओर से तुलु को अतिरिक्त प्रशासनिक भाषा का दर्जा मिलने के बाद अब संविधान की आठवीं अनुसूची में तुलु को शामिल करने की पुरानी मांग फिर तेज होने लगी है। हालांकि मौजूदा स्थिति में तुलु के लिए यह राह आसान नजर नहीं आती। विशेषज्ञों का मानना है कि केंद्र स्तर पर प्रभावी पहल और व्यापक दबाव के बिना मांग को मंजिल तक पहुंचाना चुनौतीपूर्ण होगा।
संविधान की आठवीं अनुसूची में शुरुआत में 14 भाषाएं थीं। बाद में अलग-अलग संशोधनों के जरिए इनकी संख्या बढ़ी। वर्ष 2003 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के दौरान बोडो, डोगरी, मैथिली और संथाली को शामिल किया गया। इसके बाद 23 वर्षों में एक भी नई भाषा आठवीं अनुसूची में नहीं जोड़ी गई।
35 से बढक़र 99 भाषाओं की दावेदारी
कन्नड़ विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष डॉ. पुरुषोत्तम बिलिमले के अनुसार, 2007 में आठवीं अनुसूची में शामिल किए जाने की मांग वाली सूची में तुलु, भोजपुरी, बंजारा और कोडव सहित करीब 35 भाषाएं थीं। 2011 की जनगणना के बाद यह संख्या बढक़र 99 हो गई। नई जनगणना के आंकड़े आने के बाद दावेदार भाषाओं की संख्या और बढऩे की संभावना है।
आठवीं अनुसूची से क्या मिलता है?
आठवीं अनुसूची में शामिल भाषाओं को सरकारी स्तर पर कई अवसर मिलते हैं। दूरदर्शन में प्रसारण की सुविधा, प्रतियोगी परीक्षाओं में भाषा का विकल्प, भाषा के विकास के लिए सरकारी अनुदान और भारतीय मुद्रा के नोटों पर भाषा का स्थान इसके प्रमुख लाभों में शामिल हैं।
राज्य से केंद्र तक पहुंच चुकी है मांग
तुलु को आठवीं अनुसूची में शामिल करने के लिए करीब 600 पृष्ठों की विस्तृत रिपोर्ट पहले राज्य सरकार को सौंपी जा चुकी है। राज्य की ओर से केंद्र सरकार को भी सिफारिश भेजी गई है। वर्ष 2002 में दिल्ली में सम्मेलन आयोजित कर प्रस्ताव पारित किया गया था और तत्कालीन केंद्रीय मंत्री जॉर्ज फर्नांडिस के माध्यम से तत्कालीन वाजपेयी सरकार को ज्ञापन दिया गया था। धर्मस्थल के धर्माधिकारी डॉ. डी. वीरेंद्र हेग्गड़े ने भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार के समक्ष तुलु को आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग रखी है।
तुलु के पक्ष में क्या?
30 लाख से अधिक भाषी, स्वतंत्र लिपि, स्कूलों में पाठ्यक्रम के रूप में मौजूदगी, कर्नाटक में अतिरिक्त प्रशासनिक भाषा का दर्जा और राज्य सरकार की केंद्र सरकार को सिफारिश—ये तुलु के पक्ष में प्रमुख आधार बताए जाते हैं।
सबसे बड़ी अड़चन क्या?
दावेदार भाषाओं की लगातार बढ़ती संख्या और आठवीं अनुसूची के विस्तार के साथ बढऩे वाली प्रशासनिक जिम्मेदारियां बड़ी चुनौती हैं। डॉ. बिलिमले के अनुसार, देश में हजारों मातृभाषाओं के बीच आठवीं अनुसूची में शामिल करने के लिए स्पष्ट वैज्ञानिक मानदंड की आवश्यकता है। इसी उद्देश्य से गठित सीताकांत महापात्र समिति ने भी भाषाओं के चयन के लिए व्यवस्थित मानदंड तय करने की जरूरत बताई थी।
सवाल अब यही है कि तुलु की मांग कब संवैधानिक मंजिल तक पहुंचेगी?
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