साध्वी भव्य गुणा का संदेश
नवपद ओली महापर्व: आत्मशुद्धि और आराधना का दिव्य अवसर
दावणगेरे. श्रीशंखेश्वर पाश्र्व राजेंद्र गुरुमंदिर संघ, काईपेट में विराजित साध्वी भव्य गुणा ने नवपद ओली महापर्व के अवसर पर श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि यह पर्व जैन धर्म में अत्यंत महत्वपूर्ण और शाश्वत साधना का प्रतीक है। दीपावली, रक्षाबंधन और पर्युषण जैसे पर्व वर्ष में एक बार आते हैं, जबकि नवपद ओली चैत्र और आश्विन (आसोज) मास में वर्ष में दो बार मनाई जाती है।
उन्होंने कहा कि अरिहंत के बिना जैन धर्म की कल्पना संभव नहीं है। यदि सच्ची भक्ति करनी है तो पूर्ण समर्पण आवश्यक है। अरिहंत के बिना नवपद के अन्य आठ पद भी अधूरे हैं। नवपद में अरिहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय, साधु, सम्यक दर्शन, ज्ञान, चारित्र और तप की साधना को प्रमुख बताया गया।
साध्वी ने कहा कि यह आराधना आत्मिक और शारीरिक स्वास्थ्य को बढ़ाती है, कर्मों की निर्जरा करती है तथा रोगों को दूर करने में सहायक होती है। श्रीसिद्धचक्र यंत्र नवपद की उपासना का श्रेष्ठ माध्यम है, जिसमें पंच परमेष्ठी, 24 यक्ष-यक्षिणी, 16 विद्या देवियां, 28 लब्धियां, नव निधि, अष्ट सिद्धि, अष्ट मंगल और नवग्रह का समावेश है।
साध्वी शीतल गुणा ने ऐतिहासिक प्रसंगों का उल्लेख करते हुए कहा कि राजकुमार श्रीपाल और मायना सुंदरी ने नवपद आराधना से अपने जीवन की बाधाओं को दूर कर यश और प्रतिष्ठा प्राप्त की थी। सच्ची श्रद्धा से की गई साधना से रोग और कष्ट मिट जाते हैं।
उन्होंने आयंबिल तप की विशेषता बताते हुए कहा कि इसमें बिना तेल-घी और मसालों के सादा उबला भोजन लिया जाता है, जो शरीर और मन दोनों के लिए लाभकारी है।
प्रवचन में बताया गया कि नवपद ओली के दौरान श्रद्धालुओं को प्रतिदिन प्रतिक्रमण, सामायिक, स्नात्र पूजा, स्वाध्याय, जाप, माला, प्रदक्षिणा सहित अनेक धार्मिक क्रियाएं करनी चाहिए। साध्वी ने कहा कि लोभ और तृष्णा से दूर रहकर ही सच्ची साधना संभव है और गुरु के वचनों में श्रद्धा रखने से आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त होता है।
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