शामनूर परिवार को सादिक पहलवान की चुनौती
कांग्रेस में अंदरूनी कलह तेज
मुस्लिम वोट बैंक के बीच बढ़ी हलचल
उपचुनाव बना प्रतिष्ठा की लड़ाई
दावणगेरे. दावणगेरे दक्षिण उपचुनाव इस समय राज्य की राजनीति का केंद्र बना हुआ है। कांग्रेस के भीतर ही उठी बगावत ने मुकाबले को दिलचस्प बना दिया है। शामनूर शिवशंकरप्पा परिवार के खिलाफ पार्टी के ही वरिष्ठ नेता सादिक पहलवान के मैदान में उतरने से चुनावी अखाड़ा पूरी तरह गर्म हो गया है।
कांग्रेस ने शामनूर परिवार के पोते समर्थ को टिकट दिया है, जिसके विरोध में 23 मुस्लिम उम्मीदवारों ने नामांकन दाखिल किया। इनमें सबसे प्रमुख नाम 72 वर्षीय सादिक पहलवान का है, जो वर्षों तक कांग्रेस के मजबूत स्तंभ और शामनूर शिवशंकरप्पा के करीबी सहयोगी रहे हैं। उन्हें ‘दाएं हाथ’ के रूप में भी जाना जाता था।
कौन हैं सादिक पहलवान?
दावणगेरे दक्षिण के निवासी सादिक पहलवान पिछले करीब 40 वर्षों से कांग्रेस से जुड़े हुए हैं। वे नगर परिषद के पूर्व अध्यक्ष रह चुके हैं। उनके परिवार की भी कांग्रेस में मजबूत पृष्ठभूमि रही है। मुस्लिम समाज में उनकी अच्छी पकड़ मानी जाती है। वे तंजीम संगठन के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के रूप में लंबे समय तक सेवा दे चुके हैं।
स्थानीय लोगों के अनुसार, सादिक पहलवान ने सामाजिक सुधारों में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। मुस्लिम समाज में होने वाले महंगे ‘शुकराना’ कार्यक्रम को बंद कराने में उनकी पहल को सराहा जाता है, जिससे गरीब परिवारों को राहत मिली।
टिकट की मांग और असंतोष
दावणगेरे दक्षिण में करीब 80 हजार मुस्लिम मतदाता हैं, जो इसे एक अहम फैक्टर बनाते हैं। इसी आधार पर अल्पसंख्यक समुदाय को टिकट देने की मांग लंबे समय से उठती रही है। बताया जाता है कि 2023 में भी सादिक पहलवान ने टिकट की इच्छा जताई थी, लेकिन शामनूर शिवशंकरप्पा के समझाने पर उन्होंने कदम पीछे खींच लिया था। इस बार उन्होंने खुलकर बगावत का रास्ता चुना है।
क्या होगा असर?
कांग्रेस के भीतर बगावत से कार्यकर्ताओं में असमंजस की स्थिति है। दूसरी ओर एसडीपीआई ने भी अपना उम्मीदवार मैदान में उतार दिया है, जिससे समीकरण और जटिल हो गए हैं। पार्टी स्तर पर सुलह के प्रयास जारी हैं, लेकिन अब तक कोई ठोस परिणाम सामने नहीं आया है।
फिलहाल सादिक पहलवान चुनाव प्रचार में जुटे हैं और जनता के बीच समर्थन जुटा रहे हैं। वहीं शामनूर परिवार की ओर से अब तक कोई औपचारिक वार्ता नहीं हुई है।
अब सवाल यही है कि क्या सादिक पहलवान अंत तक मैदान में डटे रहेंगे या समझौते की कोई राह निकलेगी? फिलहाल दावणगेरे का यह चुनावी रणकण राज्यभर में उत्सुकता का केंद्र बना हुआ है।
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