मेंगलूरु में जंगल की आग रोकने की नई रणनीति सफलवन कर्मियों को ब्लोअर उपयोग के बारे में प्रशिक्षण देते हुए।

मानवजनित आग पर नियंत्रण के लिए फील्ड ड्यूटी, फायर लाइन और निगरानी से मिले सकारात्मक परिणाम

मेंगलूरु. गर्मी के मौसम में जंगलों में आग लगने की घटनाएं आम मानी जाती हैं, लेकिन वन विभाग के अनुसार इन घटनाओं के पीछे प्राकृतिक कारण बहुत कम होते हैं। अधिकांश मामलों में मानव की लापरवाही या जानबूझकर किए गए कृत्य ही जिम्मेदार होते हैं। इस खतरे को कम करने के लिए मेंगलूरु वन विभाग ने एक सरल लेकिन प्रभावी रणनीति अपनाई है, जिसके सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं।

फील्ड ड्यूटी पर जोर, घटे आग के मामले

अधिकारियों का कहना है कि वन विभाग ने दिसंबर से मई तक डिप्टी रेंज फॉरेस्ट ऑफिसर (डीआरएफओ) स्तर से लेकर निचले स्तर तक सभी कर्मचारियों को कार्यालय कार्य छोडक़र पूर्ण समय फील्ड में तैनात रहने का निर्देश दिया है। जैसे-जैसे फील्ड में मौजूदगी बढ़ती है, वैसे-वैसे आग की घटनाएं घटती हैं।

इस रणनीति के तहत कर्मचारी न केवल निगरानी करते हैं, बल्कि स्थानीय लोगों से संवाद कर जागरूकता भी बढ़ाते हैं और शरारती तत्वों पर नजर रखते हैं।

फायर लाइन और फायर वॉचर्स की तैनाती

मेंगलूरु वन प्रभाग के 1.13 लाख हेक्टेयर वन क्षेत्र में दिसंबर से पहले ही 654 किलोमीटर लंबी ‘फायर लाइन’ बनाई गई है। साथ ही 74 फायर वॉचर्स की नियुक्ति की गई है, जो संवेदनशील क्षेत्रों में विशेष निगरानी रखते हैं।

अधिकारियों के अनुसार, पिछले दो वर्षों में इस योजना से बड़े स्तर की आग की घटनाओं में कमी आई है।

आधुनिक उपकरणों से सुसज्जित टीम

सुल्या क्षेत्र में वन विभाग ने ब्लोअर, फायर बीटर, फायर रेक, वाटर पंप, पाइप, स्प्रेयर और ब्रश कटर जैसे आधुनिक उपकरण उपलब्ध कराए हैं। इससे आग लगने पर तुरंत नियंत्रण संभव हो पा रहा है। हाल के दिनों में हुई बारिश ने भी आग की घटनाओं को कम करने में मदद की है।

चुनौतियां अभी भी बरकरार

हालांकि, शिशिला क्षेत्र में अग्निशमन वाहन की कमी एक बड़ी समस्या बनी हुई है। बेल्तंगडी से वाहन आने में देरी के कारण आग तेजी से फैल जाती है। स्थानीय लोगों ने इस क्षेत्र के लिए अलग से फायर वाहन और अतिरिक्त कर्मचारियों की मांग की है।

करीब 4,800 हेक्टेयर जंगल की सुरक्षा के लिए केवल 6-8 कर्मचारी होना भी चिंता का विषय है।

स्थानीय सहयोग बना अहम

आग लगने की स्थिति में स्थानीय लोग और स्वयंसेवी संगठन तुरंत सक्रिय हो जाते हैं। कई बार वे अग्निशमन दल पहुंचने से पहले ही आग पर काबू पा लेते हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि शिकारियों और लकड़ी माफिया की गतिविधियां भी जंगल की आग का बड़ा कारण हैं, जबकि प्राकृतिक कारण बहुत कम मामलों में जिम्मेदार होते हैं।

मेंगलूरु में 2025-26 तक हुई अग्निकांड घटनाओं के आंकड़े
मेंगलूरु अग्निशमन विभाग रिपोर्ट (2025-2026)

क्षेत्र — घटनाओं की संख्या — क्षति (करोड़ रु) — हानि का कारण
बंटवाल — 3 — 2.42 — बिजली शॉर्ट सर्किट
सुलिया — 4 — 1.62 — बिजली/तकनीकी कारण
पुत्तूर — 2 — 0 — कोई बड़ी क्षति नहीं

 

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By Bharat Ki Awaz

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