मोर जैसी आकृति वाली दुर्लभ प्रजाति पर विलुप्ति का खतरा, संरक्षण के लिए विशेषज्ञों की चेतावनी
मेंगलूरु: पूर्वी घाट की समृद्ध जैव विविधता में विशेष पहचान रखने वाली दुर्लभ ‘नीली मकड़ी’ के संरक्षण के लिए अब ठोस पहल तेज कर दी गई है। नागार्जुनसागर–श्रीशैलम बाघ अभयारण्य क्षेत्र में इस अनोखी प्रजाति के अस्तित्व को बचाने के लिए व्यापक सर्वेक्षण अभियान शुरू किया गया है। यह अभियान वन विभाग और पर्यावरण विशेषज्ञों के संयुक्त प्रयास से संचालित हो रहा है।
दुर्लभता और अद्भुत सुंदरता का संगम
यह मकड़ी अपने चमकीले नीले रंग और मोर जैसे आकर्षक पैटर्न के कारण विश्वभर में प्रसिद्ध है। सीमित भौगोलिक क्षेत्र में पाई जाने वाली यह प्रजाति न केवल देखने में अद्वितीय है, बल्कि जैव विविधता के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है।
विलुप्ति के कगार पर प्रजाति
वन विभाग के वरिष्ठ अधिकारी आर. श्रीनिवास ने बताया फ़्क यह प्रजाति केवल पूर्वी घाट के चुनिंदा क्षेत्रों में ही पाई जाती है। तेजी से हो रही जंगलों की कटाई, प्राकृतिक आवास का नष्ट होना और मानवीय हस्तक्षेप इसके अस्तित्व के लिए गंभीर खतरा बन चुके हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, इसकी संख्या लगातार घट रही है, जिससे इसके विलुप्त होने की आशंका बढ़ गई है।
सर्वेक्षण के पीछे उद्देश्य स्पष्ट
पर्यावरण वैज्ञानिक डॉ. लक्ष्मी प्रसाद ने कहा कि इस अभियान का मुख्य उद्देश्य इस प्रजाति की वास्तविक संख्या का आकलन करना, उसके प्राकृतिक आवास की स्थिति का अध्ययन करना और उसके सामने मौजूद खतरों की पहचान करना है। सर्वेक्षण के आधार पर दीर्घकालीन संरक्षण योजना तैयार की जाएगी, जिससे इस दुर्लभ जीव को बचाया जा सके।
पारिस्थितिकी संतुलन में अहम भूमिका
विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी प्रजातियां पारिस्थितिकी संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। ये जीव पर्यावरण की सेहत के संकेतक भी होते हैं, जिनकी उपस्थिति जैव विविधता की समृद्धि को दर्शाती है।
तत्काल कार्रवाई की जरूरत
विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यदि समय रहते ठोस और प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो यह अनोखी प्रजाति हमेशा के लिए समाप्त हो सकती है। इसके संरक्षण के लिए कानूनी सुरक्षा के साथ-साथ स्थानीय समुदाय की सक्रिय भागीदारी भी आवश्यक बताई जा रही है।
जागरूकता और शोध को मिलेगा बढ़ावा
यह सर्वेक्षण अभियान न केवल संरक्षण प्रयासों को मजबूत करेगा, बल्कि वैज्ञानिक अनुसंधान और जनजागरूकता को भी नई दिशा देगा। इससे दुर्लभ जीवों के प्रति लोगों में संवेदनशीलता बढ़ने की उम्मीद है।
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