कैसल रॉक क्षेत्र में वर्षा के दिनों में कमी से कृषि, पर्यावरण और सुपा जलाशय पर असर की आशंका
दांडेली (उत्तर कन्नड़). गोवा सीमा से सटे उत्तर कन्नड़ जिले के कैसल रॉक क्षेत्र को कभी “उत्तर कन्नड़ का चेरापूंजी” कहा जाता था। वर्ष में 6,000 से 7,000 मिमी तक वर्षा दर्ज करने वाला यह इलाका अब वर्षा में कमी और अनियमितता के कारण चिंता का विषय बन गया है। स्थानीय लोगों के अनुसार पिछले कुछ वर्षों से यहां बारिश के दिनों की संख्या लगातार घट रही है।
पश्चिमी घाट के घने जंगलों से घिरा कैसल रॉक क्षेत्र काली नदी के जलग्रहण क्षेत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यहां का वर्षाजल काली नदी के माध्यम से सुपा जलाशय तक पहुंचता है, जो उत्तर कर्नाटक के प्रमुख जलस्रोतों में शामिल है। ऐसे में क्षेत्र में बारिश में गिरावट का असर जलाशय के जलस्तर पर भी पड़ सकता है।
बारिश के पैटर्न में आया बदलाव
उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2011 में कैसल रॉक में 7,083 मिमी, 2012 में 6,165 मिमी और 2014 में 5,956 मिमी बारिश दर्ज की गई थी। पहले जून से सितंबर तक लगातार बारिश होती थी, लेकिन अब कुछ दिनों में अत्यधिक वर्षा के बाद लंबे अंतराल देखने को मिल रहे हैं।
कृषि और जलस्रोतों पर असर
विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन, वनों की कटाई, भूमि उपयोग में बदलाव और पर्यावरणीय असंतुलन इसके प्रमुख कारण हैं। वर्षा में कमी के कारण नालों और जलधाराओं का प्रवाह घट रहा है, जिससे गर्मियों में पेयजल संकट गहराने लगा है। सुपारी और काली मिर्च जैसी वर्षा आधारित फसलों पर भी इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।
वन्यजीवों का बढ़ रहा मानव बस्तियों की ओर रुख
जंगलों में जलस्रोत सूखने से वन्यजीवों के आबादी वाले क्षेत्रों की ओर आने की घटनाएं भी बढ़ रही हैं। कभी बादलों का घर कहे जाने वाले कैसल रॉक में बारिश के स्वरूप में आ रहा बदलाव अब केवल स्थानीय मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि काली नदी बेसिन और सुपा जलाशय के भविष्य से भी जुड़ा अहम प्रश्न बन गया है।
कैसल रॉक में वर्षा की घटती मात्रा केवल स्थानीय चिंता नहीं है, बल्कि यह काली नदी के जलग्रहण क्षेत्र और सुपा जलाशय के भविष्य के लिए भी गंभीर संकेत है।
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