भिक्षा से व्यवसाय तक का सफरमंजुनाथ नरेगल।

7 साल रेलवे स्टेशन पर गुजारा, अब खुद के दम पर आत्मनिर्भर जीवन

कोप्पल के ट्रांसजेंडर मंजुनाथ नरेगल की प्रेरक कहानी

लोन लेकर शुरू किया जेरॉक्स-पान शॉप

हर महीने 50 हजार तक कमाई

कोप्पल. कहते हैं अगर हौसला हो तो हालात बदलते देर नहीं लगती। कर्नाटक के कोप्पल जिले के ट्रांसजेंडर मंजुनाथ नरेगल की कहानी इसी का जीता-जागता उदाहरण है, जिन्होंने भिक्षावृत्ति छोडक़र आज स्वावलंबन की मिसाल कायम की है।

7 साल तक रेलवे स्टेशन पर भीख मांगकर गुजारा

मंजुनाथ बचपन में ही शारीरिक बदलाव के कारण घर छोडऩे को मजबूर हो गए थे। इसके बाद वे बेंगलूरु रेलवे स्टेशन पर अन्य ट्रांसजेंडर समुदाय के साथ जुडक़र करीब 7 वर्षों तक भिक्षा मांगकर जीवन यापन करते रहे।

एक प्रेरणा ने बदली जिंदगी

एक दिन रेलवे स्टेशन पर एक दिव्यांग व्यक्ति को पेन और किताब बेचकर जीवन चलाते देख मंजुनाथ को गहरी प्रेरणा मिली।

उन्होंने सोचा कि जब शारीरिक रूप से असमर्थ व्यक्ति मेहनत कर सकता है, तो मैं क्यों नहीं? यही सोच उनके जीवन का टर्निंग पॉइंट बन गई।

2011-12 में भिक्षा को कहा अलविदा

मंजुनाथ ने 2011-12 में भिक्षा मांगना पूरी तरह छोड़ दिया और अपने गृह जिले कोप्पल लौट आए। शुरुआत में उन्हें काम पाने में काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा।

बाद में एक निजी होटल में करीब 3 साल तक काम किया, लेकिन कम आय के कारण जीवन चलाना मुश्किल था।

सरकारी योजना से मिला सहारा

महिला एवं बाल विकास विभाग की मदद से मंजुनाथ ने “उद्योगिनी योजना” के तहत 1 लाख रुपए का लोन लिया और एक छोटी जेरॉक्स-पान शॉप शुरू की।

धीरे-धीरे उन्होंने अपने व्यवसाय को बढ़ाया और नई मशीनें लगाईं, जिससे आय में भी इजाफा हुआ।

आज बन गए आत्मनिर्भर

आज मंजुनाथ रोजाना 1500 से 2000 रुपए तक कमा रहे हैं और उनकी मासिक आय करीब 50 हजार रुपए तक पहुंच चुकी है।

परिवार ने भी उन्हें स्वीकार कर लिया है और अब वे सम्मानजनक जीवन जी रहे हैं।

समाज को दिया संदेश

मंजुनाथ कहते हैं कि मेरे जैसे ट्रांसजेंडर किसी को भीख नहीं मांगनी चाहिए। खुद का काम शुरू कर आत्मनिर्भर बनना चाहिए।

मंजुनाथ नरेगल की यह कहानी न केवल संघर्ष की मिसाल है, बल्कि यह भी दिखाती है कि सही मार्गदर्शन और आत्मविश्वास से कोई भी अपनी जिंदगी बदल सकता है।

 

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By Bharat Ki Awaz

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