अतिक्रमण, कंक्रीटीकरण और प्रदूषण से सिमटता गया ऐतिहासिक जलाशय
गदग। एक समय था, जब जहां तक नजर जाती थी, हरियाली ही हरियाली दिखाई देती थी। बीच में मैं था—विशाल, शांत और जीवंत। मेरे पानी में मछलियां अठखेलियां करतीं, आकाश में पक्षी चहचहाते और सूर्य की किरणों से मेरा जल चमक उठता। मेरा नाम था—‘भीष्म’।
गदग की पहचान रहे इस जलाशय की कहानी आज दर्द में बदल गई है। कभी सैकड़ों एकड़ में फैले भीष्म की सुंदरता साहित्यकारों और कवियों को आकर्षित करती थी। यह शहर के लिए केवल जलस्रोत नहीं, बल्कि जीवन और प्रकृति का आधार था।
विकास के नाम पर सिकुड़ता गया दायरा
शहरीकरण और आधुनिकीकरण के नाम पर जलाशय के आसपास कंक्रीट और सडक़ों का विस्तार होता गया। मिट्टी का प्राकृतिक किनारा गायब हुआ और उसकी जगह पत्थर व सीमेंट की दीवारों ने ले ली। सडक़, उद्यान और अन्य निर्माणों के बीच जलाशय का क्षेत्र लगातार सिमटता गया।
प्रकृति से टूटा नाता
कभी बारिश में लबालब भरने वाला भीष्म मछलियों, मेंढकों, कीट-पतंगों और पक्षियों का आश्रय था। आज कचरा, गंदा पानी और अन्य प्रदूषण इसके अस्तित्व को निगल रहे हैं। जलाशय खुद प्यासा है और वर्षा का पानी भी उसकी जरूरत पूरी नहीं कर पा रहा।
जलाशय के निकट स्थापित बसवन्ना की प्रतिमा से मानो वह अपनी व्यथा कह रहा है कि मेरी पुकार को वचन बनाकर लोगों को जगाइए। लेकिन चारों ओर खामोशी है।
अब भीष्म किसी कृत्रिम सहारे से ही सही, फिर से जीवित होने की आस लगाए बैठा है। उसकी आंखों के सामने मछलियां मर रही हैं और वह असहाय होकर सब देख रहा है।
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