एनएच-73 चौड़ीकरण के लिए 39 एकड़ जंगल की जमीन
343.74 करोड़ की परियोजना से जलस्रोत, वन्यजीव और भूस्खलन को लेकर चिंता
बेल्तंगडी (दक्षिण कन्नड़)। चारमाडी घाट में सडक़ चौड़ीकरण की योजना ने पर्यावरण को लेकर नई चिंता खड़ी कर दी है। बीसी रोड-चारमाडी राष्ट्रीय राजमार्ग-73 के विस्तार के लिए करीब 39 एकड़ वन भूमि के इस्तेमाल और 7,540 पेड़ों को हटाने का आकलन वन विभाग ने तैयार किया है। प्रस्ताव सामने आने के बाद पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने इसका विरोध शुरू कर दिया है।
चारमाडी से चिक्कमगलूर जिले की सीमा तक करीब 11 किलोमीटर सडक़ चौड़ी करने की योजना है। करीब 343.74 करोड़ रुपए की इस परियोजना को 2023-24 में मंजूरी मिली थी। टेंडर के बाद काम एसएलवी अर्थ मूवर्स को सौंपा गया है। वन विभाग ने प्रभावित पेड़ों की गणना पूरी कर ली है। पेड़ों की संख्या, वन भूमि और बदले में उपलब्ध कराई जाने वाली भूमि सहित आवश्यक जानकारी केंद्र सरकार को भेजी गई है। हालांकि, पेड़ काटने की अंतिम अनुमति अभी नहीं मिली है।
13 हेयरपिन मोड़ होंगे आसान
परियोजना के तहत चारमाडी घाट के 13 हेयरपिन मोड़ों को कुछ हद तक सीधा करने और सडक़ चौड़ी करने की योजना है। सरकार का उद्देश्य घाट क्षेत्र में आवागमन को अधिक सुरक्षित और सुगम बनाना है। लेकिन पर्यावरणविदों की चिंता है कि निर्माण के लिए बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई से पहाड़ी पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित हो सकता है।
जलस्रोतों पर भी असर की आशंका
चारमाडी घाट में नेत्रावती समेत कई जलस्रोतों का उद्गम क्षेत्र है। पर्यावरण कार्यकर्ताओं के अनुसार पेड़ों की कटाई से मिट्टी की नमी, जल का जमीन में रिसाव और जलस्रोतों का प्राकृतिक प्रवाह प्रभावित हो सकता है।
यह क्षेत्र हाथी, तेंदुआ और जंगली भैसा समेत कई वन्यजीवों का आवास और आवागमन क्षेत्र भी है। सडक़ चौड़ीकरण से इनके प्राकृतिक मार्ग बाधित होने और भविष्य में मानव-वन्यजीव संघर्ष बढऩे की आशंका जताई गई है।
भूस्खलन का खतरा भी
चारमाडी घाट में बारिश के दौरान पहले से भूस्खलन की घटनाएं होती रही हैं। पर्यावरणविदों का कहना है कि पहाड़ी ढलानों से बड़े पैमाने पर पेड़ हटाने पर मिट्टी कमजोर हो सकती है और भूस्खलन का जोखिम बढ़ सकता है। उन्होंने परियोजना के लिए वैकल्पिक विकल्पों पर विचार करने, वन क्षेत्र में कटाव कम करने तथा विस्तृत भूवैज्ञानिक और भूस्खलन अध्ययन कराने की मांग की है।
पर्यावरण प्रेमी विवेक एम. ने कहा कि हजारों पेड़ों की कटाई से जलस्रोतों और पर्यावरण पर असर पड़ सकता है। इस संबंध में राज्य और केंद्र सरकार के अधिकारियों को पत्र भेजकर पर्यावरणीय जोखिमों से अवगत कराया गया है।
दक्षिण कन्नड़ के डीएफओ रविशंकर ने बताया कि पेड़ों की गणना पूरी कर आवश्यक जानकारी केंद्र सरकार को भेज दी गई है। पेड़ हटाने की अनुमति अभी केंद्र से नहीं मिली है।
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