कृष्णा जल विवाद: कर्नाटक-महाराष्ट्र की पांच दशक पुरानी खींचतान, समाधान अब भी दूरआलमट्टी बांध।

हुब्बल्ली। कृष्णा नदी के जल बंटवारे का विवाद एक बार फिर कर्नाटक और महाराष्ट्र को आमने-सामने खड़ा कर रहा है। पांच दशक से अधिक समय बीतने, दो जल विवाद न्यायाधिकरणों के गठन और फैसलों के बावजूद इस विवाद का स्थायी समाधान नहीं निकल पाया है। अब महाराष्ट्र की ओर से 40 टीएमसी फीट बाढ़ का पानी भीमा नदी की ओर मोडऩे की प्रस्तावित योजना ने कर्नाटक की चिंताएं बढ़ा दी हैं।

सवाल यह नहीं है कि बाढ़ के पानी का उपयोग होना चाहिए या नहीं। निश्चित रूप से अतिरिक्त जल का बेहतर इस्तेमाल किसानों और सूखाग्रस्त क्षेत्रों के लिए लाभकारी हो सकता है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि कोई राज्य एकतरफा निर्णय लेकर दूसरे राज्य के जल हितों को प्रभावित करे। कर्नाटक की आशंका है कि प्रस्तावित योजना से आलमट्टी बांध में पानी की आवक पर असर पड़ सकता है। इस आशंका की तकनीकी जांच और स्पष्ट जवाब जरूरी है।

कृष्णा जल विवाद का इतिहास बताता है कि केवल न्यायाधिकरणों के फैसले से समस्या का अंत नहीं होता। राज्यों के बीच भरोसे की कमी, कानूनी अड़चनें और राजनीतिक हित जल प्रबंधन को लगातार जटिल बनाते रहे हैं। तेलंगाना के गठन के बाद चार राज्यों के हित जुडऩे से चुनौती और बढ़ गई है।

महाराष्ट्र को अपनी प्रस्तावित योजना के जलवैज्ञानिक आधार, पानी की उपलब्धता और निचले राज्यों पर पडऩे वाले प्रभाव का पूरा विवरण सामने रखना चाहिए। वहीं कर्नाटक को भी तथ्यों और कानूनी प्रावधानों के आधार पर अपनी आपत्ति दर्ज करानी चाहिए। इस मुद्दे को राजनीतिक बयानबाजी या क्षेत्रीय भावनाओं की भेंट चढ़ाना किसी के हित में नहीं होगा।

केंद्र सरकार की जिम्मेदारी है कि वह सभी संबंधित राज्यों को एक मंच पर लाकर पारदर्शी चर्चा कराए। नदी का पानी किसी एक राज्य की जागीर नहीं, बल्कि साझा प्राकृतिक संसाधन है। इसका उपयोग भी न्यायसंगत और सहमति आधारित होना चाहिए।

पांच दशक पुरानी जल लड़ाई का समाधान एक और टकराव में नहीं, बल्कि संवाद, वैज्ञानिक आकलन और न्यायपूर्ण बंटवारे में छिपा है। किसानों के खेतों तक पानी पहुंचना प्राथमिकता होनी चाहिए, न कि राज्यों के बीच विवाद की नई धारा बहाना।

 

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By Bharat Ki Awaz

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