अक्टूबर में सामान्य से 50 प्रतिशत कम बारिश
धारवाड़ जिले में 2.38 लाख हेक्टेयर के लक्ष्य के मुकाबले अब तक महज 76 हजार हेक्टेयर में बुवाई, चना-ज्वार-गेहूं पर संकट
हुब्बल्ली। खरीफ सीजन में बारिश की बेरुखी झेल चुके किसानों की मुश्किलें रबी में भी कम नहीं हुई हैं। मानसून के बाद अपेक्षित बारिश नहीं होने से खेतों में नमी गायब है और बुवाई की रफ्तार थम गई है। जिले में रबी फसलों की बुवाई का अनुकूल समय बीतने को है, लेकिन 28 अक्टूबर तक लक्ष्य के मुकाबले केवल करीब 32 प्रतिशत क्षेत्र में ही बुवाई हो पाई है। ऐसे में चना, ज्वार और गेहूं की पैदावार पर संकट मंडराने लगा है।
कृषि विभाग के आंकड़ों के अनुसार, जिले में रबी बुवाई का लक्ष्य 2,38,773 हेक्टेयर है। इसके मुकाबले अब तक 76,033 हेक्टेयर में ही बुवाई हुई है। यानी करीब 1.63 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में बुवाई बाकी है।
आधी बारिश ने बिगाड़ा खेती का गणित
अक्टूबर में जिले में सामान्य तौर पर 105.6 मिमी बारिश होती है, लेकिन इस साल केवल 52.5 मिमी वर्षा दर्ज की गई। यानी बारिश में करीब 50 प्रतिशत की कमी रही। नवलगुंद, कुंदगोल और अण्णिगेरी जैसे क्षेत्रों में अक्टूबर के अंत तक बुवाई पूरी हो जाती थी, लेकिन इस बार नमी के अभाव में किसान खेतों में बीज डालने से भी हिचक रहे हैं।
अंकुरण से पहले ही सूख रही उम्मीद
धारवाड़ क्षेत्र में कुछ किसानों ने हल्की बारिश के भरोसे चने की बुवाई कर दी थी। बाद में बारिश नहीं होने से कई खेतों में बीज अंकुरित नहीं हुए, जबकि जहां पौधे निकले हैं, वे तेज धूप में मुरझाने लगे हैं। कोटूर के एक किसान के अनुसार, चने की बुवाई के लिए बीज और खाद पर 10 से 12 हजार रुपए खर्च किए, लेकिन अब फसल सूखने की आशंका है। उन्होंने सरकार से संकटग्रस्त किसानों की मदद की मांग की है।
89 प्रतिशत बीज वितरित
कृषि विभाग ने रबी के लिए 28,486 क्विंटल बीज का भंडारण किया था। इसमें से 25,544 क्विंटल यानी करीब 89 प्रतिशत किसानों को वितरित किया जा चुका है। चने के लिए उपलब्ध 28,038 क्विंटल बीज में से 25,383 क्विंटल वितरित हुआ है। विभाग के पास अभी करीब 2,600 क्विंटल चने का बीज उपलब्ध है।
देर से बुवाई पर घटेगी पैदावार
कृषि वैज्ञानिक बसवराज एणगी ने चेताया कि अक्टूबर रबी फसलों की बुवाई के लिए अनुकूल समय होता है। इसके बाद बुवाई करने पर उत्पादन घट सकता है। उनके अनुसार, फूल आने और फलियां बनने के समय तापमान बढऩे से दाने ठीक से विकसित नहीं हो पाते। इससे किसानों को कम पैदावार का नुकसान उठाना पड़ सकता है।
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