जहां रातभर जलती है सपनों की रोशनी
पार्ट-टाइम नौकरी, किराए का कमरा और सरकारी नौकरी का सपना…
धारवाड़. सुबह के छह बजते ही धारवाड़ के सप्तापुर में सिर्फ सूरज नहीं उगता, हजारों सपने भी आंखें खोलते हैं। संकरी गलियों के किराए के कमरों, पेइंग गेस्ट हॉस्टलों और पुराने मकानों की मंजिलों से निकलने वाले ये युवा देखने में सामान्य नौकरीपेशा लगते हैं, लेकिन उनकी असली पहचान सरकारी नौकरी के अभ्यर्थियों की है। कोई मेस में भोजन परोसता है, कोई स्कूल बस में परिचालक है, कोई डिलीवरी बॉय, तो कोई सुपरमार्केट में काम करता है। दिनभर की मेहनत के बाद रात उनकी किताबों के नाम होती है।
रोटी की जंग के साथ नौकरी की तैयारी
एक कमरे में पांच-छह युवाओं का साथ रहना यहां सामान्य बात है। सीमित आय, बढ़ते खर्च और परिवार की कमजोर आर्थिक स्थिति के बीच अधिकांश अभ्यर्थी पढ़ाई का खर्च स्वयं उठाते हैं। किराया, भोजन, पुस्तकें, पुस्तकालय शुल्क और परीक्षा आवेदन मिलाकर हर महीने हजारों रुपए की जरूरत पड़ती है। ऐसे में पार्ट-टाइम नौकरी उनकी मजबूरी नहीं, बल्कि सपनों को जिंदा रखने का माध्यम बन जाती है।
गदग जिले के रघुनंदन बेट्टप्पनवर सुबह और शाम स्कूल बस में परिचालक का काम करते हैं। दिन का शेष समय पुलिस कांस्टेबल भर्ती की तैयारी में बीतता है। उनका कहना है, “दिनभर काम के बाद शरीर थक जाता है, लेकिन पढ़ाई किए बिना सो जाऊं तो लगता है, पूरा दिन व्यर्थ चला गया।”
संघर्ष की अपनी-अपनी कहानी
सुपरमार्केट में काम करने वाली एक युवती हर महीने छह हजार रुपए कमाती हैं। इसी आय से किराया, भोजन और किताबों का खर्च निकालती हैं। दोपहर बाद उनकी वास्तविक दिनचर्या शुरू होती है, जब वे पुलिस भर्ती परीक्षा की तैयारी में जुट जाती हैं। उनका कहना है कि यदि नौकरी न करतीं तो पढ़ाई जारी रखना संभव नहीं होता।
रात्रि पाली में सुरक्षा गार्ड, पुस्तकालय सहायक, ट्यूशन शिक्षक और कोचिंग संस्थानों में पढ़ाने वाले अनेक युवा भी इसी संघर्ष का हिस्सा हैं। वे अपनी पढ़ाई में बाधा न आए, इसलिए ऐसे काम चुनते हैं जिनमें खाली समय का उपयोग अध्ययन के लिए किया जा सके।
संघर्ष से बनी एक अलग दुनिया
सप्तापुर और श्रीनगर क्षेत्र अब केवल छात्र बस्तियां नहीं, बल्कि प्रतियोगी परीक्षाओं का जीवंत संसार बन चुके हैं। चाय की दुकानों पर नई भर्तियों की चर्चा होती है, पुस्तक दुकानों पर प्रश्नपत्रों की नई श्रृंखला पूछी जाती है और मेस में भोजन के साथ कट-ऑफ तथा पाठ्यक्रम पर बहस चलती है। शहर में 80 से अधिक कोचिंग संस्थान हजारों अभ्यर्थियों को प्रशिक्षण दे रहे हैं।
हालांकि, हर किसी को जल्दी सफलता नहीं मिलती। भर्ती प्रक्रियाओं में देरी, परीक्षा रद्द होने और न्यायालयी विवादों के बीच कई युवा वर्षों तक यहीं संघर्ष करते रहते हैं। उम्र बढ़ती जाती है, लेकिन उम्मीद नहीं टूटती।
सिर्फ नौकरी नहीं, जीवन बदलने की लड़ाई
धारवाड़ के ये युवा केवल सरकारी नौकरी पाने के लिए नहीं पढ़ रहे, बल्कि आर्थिक विषमता के खिलाफ संघर्ष कर रहे हैं। मेस में परोसी गई हर थाली, पहुंचाया गया हर पार्सल, स्कूल बस में बिताया हर सफर और रात की हर ड्यूटी उनके लिए महज रोजगार नहीं, बल्कि भविष्य में निवेश है।
इसीलिए धारवाड़ की लाइब्रेरियों की रोशनी देर रात तक बुझती नहीं। वह केवल किताबों पर नहीं, बल्कि उन हजारों युवाओं की उम्मीदों पर भी पड़ती है, जो मानते हैं कि शिक्षा और सरकारी नौकरी ही उनके जीवन की दिशा बदल सकती है।
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