6 साल में 602 संस्थानों पर ताला
कोविड के बाद दाखिला घटा, कई ट्रेड खाली
निजी क्षेत्र में मांग बरकरार, युवाओं का रुझान कम
शिवमोग्गा. कभी गरीब और मध्यवर्गीय युवाओं के लिए रोजगार की “सुनहरी गारंटी” माने जाने वाले इंडस्ट्रियल ट्रेनिंग इंस्टिट्यूट (आईटीआई) आज अभूतपूर्व संकट से जूझ रहे हैं। कोविड के बाद दाखिले में भारी गिरावट आने से पिछले छह वर्षों में 602 आईटीआई बंद हो चुके हैं। 2017 में राज्य में 1800 आईटीआई थे, जो अब घटकर 1701 रह गए हैं।
1960 से 1980 तक आईटीआई या डिप्लोमा धारकों को सरकारी उद्योगों में स्थायी नौकरी लगभग तय मानी जाती थी। निजी क्षेत्र में भी इनकी भारी मांग थी। 2015 तक दाखिले के लिए कड़ी प्रतिस्पर्धा रहती थी, लेकिन कोविड के बाद हालात बदल गए।
दाखिले में गिरावट
वर्तमान में 270 सरकारी, 192 अनुदानित और 836 निजी आईटीआई चल रहे हैं। इनमें कुल 97 हजार सीटें हैं, परन्तु दाखिला 70 हजार से भी कम है। कई संस्थानों में ड्रेस मेकिंग, वेल्डर, टर्नर, मोटर मैकेनिक जैसे ट्रेड पूरी तरह खाली हैं। केवल इलेक्ट्रिशियन, इलेक्ट्रॉनिक मैकेनिक और सीएनसी तकनीशियन जैसे आधुनिक ट्रेडों में ही छात्रों का रुझान दिख रहा है।
रुझान क्यों घटा
अभिभावकों की इच्छा है कि बच्चे उच्च शिक्षा हासिल करें। साथ ही यह धारणा फैल गई है कि आईटीआई के बाद केवल छोटे काम ही मिलते हैं और प्रतियोगी परीक्षाओं में भी लाभ नहीं होता। इस मानसिकता ने आईटीआई की लोकप्रियता पर गहरा असर डाला है।
उद्योगों में मांग बरकरार
निजी कंपनियां आज भी कुशल तकनीशियनों की तलाश में हैं। कई कंपनियां अप्रेंटिसशिप देकर युवाओं को ट्रेनिंग के साथ नौकरी भी दे रही हैं। इसके बावजूद इच्छुक युवाओं की संख्या घट रही है।
आईटीआई निदेशक एन.एस. चिदानंद ने बताया कि तकनीकी बदलावों के अनुसार कोर्स अपग्रेड किए जा रहे हैं और 1500 नए प्रशिक्षकों की नियुक्ति भी हुई है। फिर भी युवाओं का रुझान कम होना सबसे बड़ी चुनौती है।
कौशल विकास की रीढ़ माने जाने वाले आईटीआई को फिर से “रोजगार की सीढ़ी” बनाने के लिए बड़े स्तर पर जागरूकता और सुधार की आवश्यकता महसूस की जा रही है।

