गन्ना किसानों के आंदोलन के बीच केंद्र का भरोसा; उचित एवं लाभकारी मूल्य बढ़ाने पर होगा विचार
चीनी का एमएसपी 31 रुपए न्यूनतम बिक्री मूल्य
गन्ने पर लागू होता है एफआरपी
कर्नाटक को एसएपी लागू करने की सलाह
चीनी बाजार में 40-47 रुपए किलो तक दाम होने का दावा
इस साल भी एफआरपी बढ़ाने का संकेत
एथेनॉल खरीद 38 करोड़ से बढ़ाकर 1,200 करोड़ लीटर करने की बात
हुब्बल्ली। गन्ने की कीमत और चीनी के न्यूनतम बिक्री मूल्य में बढ़ोतरी समेत विभिन्न मांगों को लेकर हुब्बल्ली में गन्ना किसानों के बड़े प्रदर्शन के बाद केंद्रीय खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति मंत्री प्रल्हाद जोशी ने बुधवार को नई दिल्ली में संवाददाता सम्मेलन आयोजित कर केंद्र का रुख स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार किसानों की समस्याओं पर बातचीत के लिए तैयार है और आगामी 12 अक्टूबर को किसान नेताओं के साथ बैठक होने की संभावना है।
जोशी ने चीनी के एमएसपी और गन्ने के एफआरपी को लेकर चल रही बहस पर भी स्थिति स्पष्ट की। उन्होंने कहा कि चीनी के लिए एमएसपी का अर्थ मिनिमम सपोर्ट प्राइस नहीं, बल्कि मिनिमम सेलिंग प्राइस यानी न्यूनतम बिक्री मूल्य है। दूसरी ओर, गन्ने के लिए एफआरपी यानी उचित एवं लाभकारी मूल्य लागू होता है। उनके अनुसार दोनों की अलग-अलग भूमिका है।
केंद्रीय मंत्री ने कहा कि चीनी मिलें 31 रुपए के न्यूनतम बिक्री मूल्य से कम कीमत पर चीनी नहीं बेच सकतीं। केंद्र सरकार ने वर्ष 2018 में चीनी के लिए न्यूनतम बिक्री मूल्य लागू किया था। जोशी के मुताबिक वर्तमान एमएसपी 31 रुपए है, जबकि बाजार में चीनी 40 से 47 रुपए प्रति किलो तक बिक रही है। पिछले वर्ष यह कीमत 38-39 रुपए के आसपास थी।
12 अक्टूबर को किसानों से बातचीत
जोशी ने कहा कि कर्नाटक के गन्ना किसानों की समस्याओं पर केंद्र सरकार खुले मन से चर्चा करने को तैयार है। किसान नेताओं के साथ 12 अक्टूबर को बैठक होने की संभावना है। इसमें किसानों की मांगों और उनके समाधान पर संबंधित मंत्रालयों तथा अधिकारियों के साथ चर्चा की जाएगी।
उन्होंने किसान नेताओं से बारिश और धूप में आंदोलन करने के बजाय दिल्ली आकर संबंधित मंत्रालयों के साथ बातचीत करने की अपील की। जोशी ने कहा कि समस्याओं के समाधान के लिए प्रभावी कदम उठाए जाएंगे।
इस साल भी बढ़ेगा एफआरपी
केंद्रीय मंत्री ने कहा कि किसानों के हित में इस वर्ष भी गन्ने का एफआरपी बढ़ाया जाएगा। उनके अनुसार मई 2026 में एफआरपी बढ़ाकर 365 रुपए किया गया था। इस वर्ष भी इसमें बढ़ोतरी की जाएगी। मूल्य निर्धारण समिति, गन्ना आयुक्त और राज्य सरकार की सिफारिशों को ध्यान में रखते हुए निर्णय लिया जाएगा।
16,600 करोड़ रुपए बकाया भुगतान का दावा
जोशी ने दावा किया कि केंद्र में नरेंद्र मोदी सरकार के आने के बाद गन्ना किसानों के बकाए में से 16,600 करोड़ रुपए के भुगतान के लिए कदम उठाए गए। उन्होंने कहा कि चीनी मिलों से किसानों को सीधे भुगतान समेत कई सुधार किए गए हैं।
उन्होंने आरोप लगाया कि 2014 से पहले किसानों को गन्ने का भुगतान पाने के लिए लंबे समय तक इंतजार करना पड़ता था। उनके अनुसार मोदी सरकार ने चीनी उद्योग और किसानों से जुड़ी कई समस्याओं को दूर करने के लिए नीतिगत बदलाव किए हैं।
एथेनॉल से मिलों को सहारा
जोशी ने कहा कि गन्ना किसानों और चीनी मिलों की आर्थिक स्थिति मजबूत करने के लिए एथेनॉल उत्पादन एवं खरीद को बढ़ावा दिया गया है। उनके मुताबिक एथेनॉल की खरीद क्षमता 38 करोड़ लीटर से बढ़ाकर 1,200 करोड़ लीटर की गई है। इससे किसानों को भुगतान मिलने की अवधि कम हुई है।
उन्होंने कहा कि पिछले वर्ष किसानों को 100 प्रतिशत भुगतान किया गया था, जबकि इस वर्ष अब तक 97 प्रतिशत भुगतान हो चुका है। चीनी मिलों से उत्पादित एथेनॉल की खरीद को प्राथमिकता देने की नीति का भी उन्होंने उल्लेख किया।
कर्नाटक भी लागू करे एसएपी
गन्ने के मूल्य को लेकर जोशी ने केंद्र और राज्य की जिम्मेदारी अलग-अलग बताते हुए कर्नाटक सरकार से स्टेट एडवाइजरी प्राइस (एसएपी) लागू करने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा और उत्तराखंड में एसएपी लागू है और इसी तरह कर्नाटक भी किसानों को एफआरपी से अतिरिक्त भुगतान सुनिश्चित करने के लिए एसएपी लागू कर सकता है।
जोशी ने सवाल उठाया कि कर्नाटक सरकार किसानों के लिए एसएपी लागू करने के बजाय चीनी मिलों पर पानी का शुल्क बढ़ा रही है। उन्होंने दावा किया कि पानी का शुल्क 5 लाख रुपए से बढ़ाकर 1 करोड़ रुपए किए जाने से मिलों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ा है।
केंद्रीय मंत्री ने कहा कि गन्ना किसानों की समस्याओं के समाधान के लिए कृषि मंत्रालय, पेट्रोलियम मंत्रालय, किसान प्रतिनिधियों और राज्य सरकार को साथ लेकर चर्चा करने के लिए केंद्र तैयार है।
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