न्यायालय में पोते सात्यकि ने स्वीकार किया
राहुल गांधी के खिलाफ मानहानि मामले की सुनवाई के दौरान विशेष अदालत में दर्ज हुआ महत्वपूर्ण बयान
पुणे. स्वतंत्रता सेनानी एवं हिंदुत्व विचारक विनायक दामोदर सावरकर द्वारा ब्रिटिश शासनकाल में जेल से रिहाई के लिए कुल 10 बार दया याचिकाएं दायर किए जाने की पुष्टि स्वयं उनके पोते सात्यकि सावरकर ने न्यायालय में की है। यह बयान सांसदों एवं विधायकों के लिए गठित विशेष न्यायालय में मानहानि मामले की सुनवाई के दौरान सामने आया।
राहुल गांधी के खिलाफ दायर आपराधिक मानहानि प्रकरण में विशेष न्यायाधीश अमोल शिंदे के समक्ष जिरह के दौरान सात्यकि सावरकर ने स्वीकार किया कि वर्ष 1911 से 1921 के बीच अंडमान की सेल्युलर जेल में बंद रहने के दौरान विनायक दामोदर सावरकर ने दया याचिकाएं प्रस्तुत की थीं। उन्होंने बताया कि सजा सुनाए जाने के पहले महीने से ही याचिकाएं भेजने की प्रक्रिया शुरू हो गई थी।
दया याचिका कानूनी प्रक्रिया थी
राहुल गांधी की ओर से अधिवक्ता मिलिंद पवार द्वारा पूछे गए प्रश्नों के उत्तर में सात्यकि सावरकर ने कहा कि दया याचिका दायर करना उस समय की मान्य कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा था। इसके माध्यम से कैदी सजा में कमी अथवा समय से पूर्व रिहाई की मांग कर सकते थे।
उन्होंने कहा कि केवल सावरकर ही नहीं, बल्कि भगत सिंह, राजगुरु, बटुकेश्वर दत्त और अशफाकउल्ला खान जैसे कई क्रांतिकारियों ने भी तत्कालीन कानून के तहत ऐसी याचिकाएं दायर की थीं।
वफादारी के आरोप को किया खारिज
सात्यकि सावरकर ने कहा कि याचिकाओं में प्रयुक्त भाषा को ब्रिटिश शासन के प्रति निष्ठा का प्रतीक मानना उचित नहीं है। उनके अनुसार वह उस दौर की आधिकारिक पत्र-व्यवहार शैली थी। उन्होंने दावा किया कि अंडमान भेजे जाने से पहले ही विनायक दामोदर सावरकर को ‘वीर सावरकर’ के नाम से जाना जाता था।
राजनीतिक बहस को मिला नया आयाम
सावरकर की दया याचिकाओं का मुद्दा लंबे समय से कांग्रेस और भाजपा-आरएसएस के बीच वैचारिक विवाद का विषय रहा है। ऐसे में उनके पोते द्वारा अदालत में दिए गए इस बयान ने इस बहस को एक बार फिर नया आयाम दे दिया है।
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