कड़े पोषण से तटीय कर्नाटक में बढ़ेगा दूध उत्पादनबछड़ा।

बछड़े पालने वाले पशुपालकों को हर माह 1,000 रुपए की मदद, 12 महीने तक मिलेगा पशु आहार

बंटवाल (दक्षिण कन्नड़)। तटीय कर्नाटक में पशुपालकों के बीच बछड़ों को पालना मुश्किल होने की धारणा और मजबूरी में उन्हें बेचने की प्रवृत्ति के कारण हर वर्ष दूध उत्पादन में गिरावट आ रही है। इस समस्या के समाधान के लिए बछड़ों के पालन-पोषण को प्रोत्साहित करने वाली विशेष योजना शुरू की गई है। इसके तहत 5 से 25 बछड़े पालने वाले तटीय क्षेत्र के पशुपालकों को मासिक सहायता दी जाएगी। दक्षिण कन्नड़ जिला सहकारी दुग्ध उत्पादक संघ इस योजना की जिम्मेदारी संभालेगा।

क्यों शुरू की गई योजना?

बछड़े के जन्म के बाद उसके गर्भधारण योग्य होने तक कुछ पशुपालक उसके पालन-पोषण पर पर्याप्त ध्यान नहीं देते। कई बार बछड़ों को बेच भी दिया जाता है। इससे भविष्य में दूध देने वाली अच्छी नस्ल की गायों की संख्या प्रभावित होती है और दूध उत्पादन में कमी आती है। परिणामस्वरूप पशुपालकों को अधिक दूध देने वाली गायों के लिए इरोड या अन्य क्षेत्रों पर निर्भर रहना पड़ता है।

इसी निर्भरता को कम करने और तटीय क्षेत्र में जन्मे बछड़ों को पौष्टिक आहार देकर स्वस्थ गायों में विकसित करने के उद्देश्य से यह योजना लागू की गई है।

हर बछड़े के लिए 1,000 रुपए का पशु आहार

‘कड़सु विकास योजना’ के तहत प्रत्येक बछड़े के पोषण के लिए दक्षिण कन्नड़ दुग्ध संघ की ओर से हर महीने 1,000 रुपए मूल्य का पशु आहार दिया जाएगा। यह सहायता प्रत्येक बछड़े को 12 महीने तक मिलेगी। योजना का लाभ 5 से 25 बछड़े पालने वाले पशुपालकों को मिलेगा।

एक महत्वपूर्ण शर्त यह है कि योजना के तहत सहायता प्राप्त बछड़े को पशुपालक केवल दक्षिण कन्नड़ और उडुपी जिले के भीतर ही बेच सकेंगे। इसका उद्देश्य तटीय क्षेत्र में ही अच्छी दूध देने वाली गायों की उपलब्धता बढ़ाना है।

‘इरोड’ पर निर्भरता घटाने की कोशिश

अधिक दूध देने और दक्षिण कन्नड़ के मौसम में जल्दी ढलने के कारण पशुपालक इरोड से गाय लाते हैं। इसके लिए दक्षिण कन्नड़ सहकारी दुग्ध संघ किसानों को सहायता भी देता है। संघ के पशु चिकित्सक और विस्तार अधिकारी किसानों के साथ इरोड जाते हैं। वहां गायों का बीमा कराया जाता है और परिवहन का खर्च भी संघ वहन करता है।

हालांकि, इरोड से गाय लाने के बजाय स्थानीय बछड़ों को बेहतर पोषण देकर अच्छी दूध देने वाली गायों में विकसित किया जा सकता है। इसी सोच के साथ ‘कड़सु विकास योजना’ शुरू की गई है।

24-26 महीने में गाय बनने की क्षमता

दक्षिण कन्नड़ जिला सहकारी दुग्ध उत्पादक संघ के अध्यक्ष रविराज हेगड़े ने कहा कि जन्म के तुरंत बाद बछड़े के पालन-पोषण पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता, जबकि वही बछड़ा आगे चलकर अच्छी गाय बन सकता है। एक बछड़ा 24 से 26 महीने में गाय बनकर बछड़ा देने में सक्षम हो जाता है। इसलिए शुरुआती अवस्था से ही पर्याप्त पोषण और देखभाल मिलने पर भविष्य में दूध उत्पादन को मजबूत किया जा सकता है। इसी उद्देश्य से कड़सु विकास योजना लागू की गई है।

 

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By Bharat Ki Awaz

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