अधूरे पुल, बदहाल सडक़ें और ठप योजनाओं के बीच जूझ रहे हुब्बल्ली-धारवाड़
हुब्बल्ली. हुब्बल्ली और धारवाड़ राज्य के प्रमुख जुड़वां शहर माने जाते हैं। हुब्बल्ली को ‘छोटा मुंबई’ तो धारवाड़ को ‘साहित्यकारों की धरती’ कहा जाता है। राजधानी बेंगलूरु के बाद व्यापार, कला और संस्कृति के क्षेत्र में इन दोनों शहरों की पहचान महत्वपूर्ण है, लेकिन विकास के मामले में दोनों शहर वर्षों से उपेक्षा का शिकार बने हुए हैं।
शहरों में सडक़ विस्तार, बड़े उद्योग, आधुनिक बाजार और बेहतर मूलभूत सुविधाओं की योजनाएं कागजों तक सीमित रह गई हैं। कई प्रमुख सडक़ें अब भी संकरी हैं और खराब सडक़ों की मरम्मत वर्षों से नहीं हुई। धूल, प्रदूषण और यातायात समस्या लगातार बढ़ती जा रही है।

शहर के उद्यानों की स्थिति भी चिंताजनक बनी हुई है। हुब्बल्ली का इंदिरा ग्लास हाउस उद्यान, उणकल झील उद्यान और धारवाड़ का साधनकेरी उद्यान बदहाली का शिकार हैं। प्रवेश शुल्क लेने के बावजूद वहां बच्चों के लिए पर्याप्त सुविधाएं नहीं हैं। ग्लास हाउस उद्यान में वर्षों पहले शुरू की गई छोटी रेल उद्घाटन के दिन ही पटरी से उतर गई थी और उसके बाद दोबारा नहीं चली।
रानी चन्नम्मा सर्कल पर बन रहा ऊपरी पुल (फ्लाई ओवर) भी वर्षों से अधूरा पड़ा है। वर्ष 2021 में लगभग 349 करोड़ रुपए की लागत से शुरू हुई इस परियोजना को 2024 तक पूरा होना था, लेकिन चार साल बाद भी निर्माण अधूरा है। क्षेत्र में बड़े-बड़े खंभे, धूल और यातायात जाम लोगों की परेशानी बढ़ा रहे हैं।
हुब्बल्ली-धारवाड़ के बीच 970 करोड़ रुपए की लागत से शुरू की गई ‘चिगरी’ बस सेवा भी अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतर सकी। वातानुकूलित बसों और विशेष गलियारे वाली इस परियोजना को आधुनिक परिवहन व्यवस्था के रूप में पेश किया गया था, लेकिन कई बसों में वातानुकूलन बंद रहता है और अक्सर बसें बीच रास्ते खराब हो जाती हैं। लोगों का आरोप है कि अवैज्ञानिक योजना और तेज रफ्तार बसों के कारण कई दुर्घटनाएं हुईं और अनेक लोगों की जान गई।
एक समय इन शहरों में जन आंदोलनों की मजबूत परंपरा थी। मामूली मूल्य वृद्धि पर भी लोग सडक़ों पर उतर आते थे। छात्र और मजदूर संगठन सरकारी कार्यालयों का घेराव करते थे। वरिष्ठ कम्युनिस्ट नेता एजे मुधोल और पत्रकार पाटील पुट्टप्पा जैसे लोगों के नेतृत्व में बड़े आंदोलन चलते थे, लेकिन अब विरोध की आवाजें लगभग शांत हो चुकी हैं।
वर्ष 1994 में रानी चन्नम्मा सर्कल के पास स्थित ईदगाह मैदान में राष्ट्रध्वज फहराने को लेकर हुए विवाद ने सांप्रदायिक हिंसा का रूप ले लिया था। उस घटना में छह लोगों की मौत हुई थी। तीन दशक बाद भी ईदगाह मैदान विवाद और राजनीति का केंद्र बना हुआ है। स्थानीय लोग कहते हैं कि शहर को बेहतर सुविधाओं की जरूरत है, लेकिन मुद्दे अब भी धार्मिक और राजनीतिक विवादों तक सीमित हैं।
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