सॉफ्टवेयर इंजीनियर ने छोड़ी नौकरी, आम की खेती से बना रहे नई पहचानयादगीर तालुक के मुंडरगी स्थित अविनाश हप्पल के आम के बाग का दौरा कर जानकारी लेते अधिकारी।

उत्तराखंड की नौकरी छोड़ युवा किसान बने अविनाश

सोशल मीडिया के जरिए बेच रहे प्राकृतिक रूप से पके आम

यादगीर. अविनाश हप्पल ने सॉफ्टवेयर इंजीनियर की अच्छी-खासी नौकरी छोडक़र खेती को अपनाया और अब आम की बागवानी में सफलता की नई कहानी लिख रहे हैं। उत्तराखंड में केंद्रीय ऊर्जा विभाग में ठेका कर्मचारी के तौर पर कार्यरत अविनाश को हर महीने लगभग 75 हजार रुपए वेतन मिलता था, लेकिन खेती के प्रति लगाव ने उन्हें अपने गांव लौटने के लिए प्रेरित किया।

यादगीर निवासी अविनाश के पास मुंडरगी के समीप यदगीर-रायचूर राष्ट्रीय राजमार्ग किनारे तीन एकड़ जमीन है। यहां उन्होंने मुख्य रूप से आम की खेती पर ध्यान केंद्रित किया है। पहले उनके पिता दुर्गप्पा आम के पेड़ों को ठेके पर व्यापारियों को दे देते थे, लेकिन अविनाश ने यह परंपरा बदल दी। अब वे खुद आम की तुड़ाई कर सोशल मीडिया के माध्यम से सीधे ग्राहकों तक पहुंचा रहे हैं।

इस वर्ष मौसम की प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण जिले में आम की पैदावार प्रभावित हुई है। ऊपर से बाहरी जिलों और राज्यों से आम की आवक बढऩे से बाजार भाव में गिरावट आई है। इसके बावजूद अविनाश ने अपनी अलग पहचान बनाई है। वे बंगनपल्ली (बेनिशान), केसर, दशहरी, मल्लिका, हिमायत, खदर, तोतापुरी, स्वर्णरेखा और मलगोवा जैसी किस्मों के आम प्राकृतिक तरीके से पकाकर बेच रहे हैं।

उन्होंने बताया कि स्थानीय बाजार के साथ-साथ बेंगलूरु, रायचूर, बल्लारी और दावणगेरे तक आम की बिक्री की जा रही है। उनके बाग में 115 पेड़ों में से 108 पेड़ों पर इस बार फल आया है। अकेले खदर किस्म के लगभग 300 किलो आम बिक चुके हैं, जबकि एक ही दिन में 800 किलो तक बिक्री हुई। इस वर्ष करीब 3 हजार किलो उत्पादन की उम्मीद है।

अविनाश अब समग्र खेती की दिशा में भी आगे बढऩा चाहते हैं। वे पोल्ट्री, डेयरी और मधुमक्खी पालन शुरू करने की योजना बना रहे हैं। बागवानी विभाग के अधिकारियों ने भी उनके प्रयासों की सराहना करते हुए तकनीकी मार्गदर्शन दिया है।

बागवानी विभाग के उपनिदेशक राघवेंद्र उक्किनाल ने कहा कि युवाओं का खेती की ओर लौटना सकारात्मक संकेत है। युवा किसान नई तकनीकों और सोशल मीडिया की मदद से स्थानीय ही नहीं, बाहरी बाजार भी तैयार कर रहे हैं। साथ ही उन्होंने आम उत्पादकों को संगठित होकर “मैंगो मेला” आयोजित करने की दिशा में आगे आने की सलाह दी।

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