स्वतंत्रता सेनानियों के गांवों में आज भी समाजसेवामूडीगेरे तालुक के हालूर गांव में निर्मित महात्मा गांधी स्मारक ‘गांधीघर’ भवन।

महात्मा गांधी की प्रेरणा से शुरू हुआ सेवा का सिलसिला

‘बापू धान्यकोष’ आज भी ग्रामीणों के लिए मददगार

मूडीगेरे (चिक्कमगलूरु)। चिक्कमगलूरु जिले के मूडीगेरे तालुक में स्वतंत्रता संग्राम की गौरवशाली विरासत आज भी समाजसेवा के रूप में जीवित है। ब्रिटिश शासन के खिलाफ संघर्ष में तालुक के 800 से अधिक लोगों ने भाग लिया और कई ने जेल की यातनाएं भी सहीं। महात्मा गांधी की प्रेरणा से स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय हुए इन लोगों ने आजादी के बाद भी गांवों की भलाई के लिए सेवा का रास्ता चुना।

स्वतंत्रता सेनानी हालूर के के. गिड्डप्पा और मुद्रेमने के बी. कृष्णेगौड़ा के आमंत्रण पर महात्मा गांधी ने गांधीनगर और भारतिबैल गांवों का दौरा किया था। दोनों स्थानों पर शिविर लगाकर उन्होंने लोगों को अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष के लिए प्रेरित किया। इन शिविरों में 200 से अधिक स्वतंत्रता सेनानियों ने हिस्सा लिया था।

महात्मा गांधी की यात्रा की याद में ‘गांधीघर’

महात्मा गांधी के शिविर वाले स्थान को बाद में ‘गांधीघर’ नाम दिया गया। वर्ष 1957 में केंद्र सरकार के गांधी स्मारक निधि से 25 हजार रुपए की लागत से यहां गांधी स्मारक भवन बनाया गया। यह भवन आज भी स्वतंत्रता आंदोलन की स्मृतियों को संजोए हुए है।

स्वतंत्रता सेनानियों में गिड्डप्पा की भूमिका प्रमुख रही। उस दौर के कई लोगों ने सरकारी पेंशन लेने से भी इनकार कर दिया था। स्वतंत्रता के बाद गांवों की सुविधा और जरूरतमंदों की सहायता के लिए ‘बापू धान्यकोष’ संस्था की स्थापना की गई।

400 ग्रामीण बने संस्था के हिस्सेदार

हालूर, जोगण्णकेरे, अबचूर, सचिननगर और चक्रमणि गांवों के करीब 400 लोग संस्था के हिस्सेदार हैं। संस्था ने ग्रामीणों के विवाह और अन्य कार्यक्रमों के लिए बर्तन, कुर्सियां, मेज सहित आवश्यक सामग्री उपलब्ध कराई है। बैंक में नकद जमा भी रखा गया है और संस्था का कुल कारोबार करीब 50 लाख रुपए बताया गया है।

कारगिल युद्ध के दौरान संस्था ने भारतीय सेना के लिए 10 लाख रुपए का योगदान दिया था। पहले धान की खेती अधिक होने पर गौरी-गणेश उत्सव के लिए प्रत्येक परिवार को एक क्विंटल धान दिया जाता था, जिसे अगले वर्ष फरवरी में 110 किलोग्राम धान के रूप में संस्था को लौटाना होता था। अब धान की खेती कम होने के कारण प्रत्येक परिवार को उत्सव के लिए 1,000 रुपए दिए जाते हैं, जिन्हें फरवरी में वापस करना होता है।

महात्मा गांधी की यात्रा की स्मृति में यहां रखा चरखा अब टूट चुका है। गांधीघर भवन से करीब डेढ़ किलोमीटर दूर मूडीगेरे-बेलूर राष्ट्रीय राजमार्ग पर यात्रियों के लिए विश्राम स्थल भी बनाया गया है, जिसका नाम गांधीघर रखा गया है। स्वतंत्रता सेनानियों की पीढ़ी भले ही अब नहीं रही, लेकिन उनके सेवा और सहयोग की परंपरा आज भी जारी है।

 

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By Bharat Ki Awaz

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