अनुकंपा नियुक्ति न जन्मसिद्ध अधिकार, न विरासत : हाईकोर्टकर्नाटक हाईकोर्ट धारवाड़ पीठ।

मां की देखभाल का हवाला देकर नियुक्ति नियमों को दरकिनार नहीं किया जा सकता

मृत चालक के भाई को नौकरी देने का पूर्व आदेश रद्द

धारवाड़। सरकारी और निगमों की नौकरियां पैतृक संपत्ति नहीं हैं, जिन्हें एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तांतरित किया जा सके। मां की देखभाल करना सराहनीय जिम्मेदारी है, लेकिन केवल इस आधार पर नियुक्ति नियमों को दरकिनार कर अनुकंपा के आधार पर नौकरी देने का आदेश नहीं दिया जा सकता। कर्नाटक हाईकोर्ट की धारवाड़ पीठ ने यह महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए मृत चालक के भाई को नौकरी देने संबंधी पूर्व आदेश रद्द कर दिया।

न्यायाधीश एम. नागप्रसन्ना और न्यायाधीश हेमा कुलकर्णी की खंडपीठ ने कल्याण कर्नाटक सडक़ परिवहन निगम (केकेआरटीसी) की अपील स्वीकार करते हुए यह फैसला सुनाया।

यह है मामला

केकेआरटीसी के बल्लारी डिवीजन में चालक रहे वीरश मांतप्पा लोलसार की सितंबर 2023 में सेवाकाल के दौरान मृत्यु हो गई थी। उनकी पत्नी सुनंदा का अप्रेल 2022 में ही निधन हो चुका था और दंपती की कोई संतान नहीं थी। इसके बाद उनकी 65 वर्षीय मां मांतव्वा ने निगम से अपने दूसरे बेटे संगण्णा लोलसार को अनुकंपा के आधार पर नौकरी देने की मांग की थी। उनका कहना था कि वृद्धावस्था के कारण वे स्वयं नौकरी करने में सक्षम नहीं हैं और बेटे पर उनकी देखभाल की जिम्मेदारी है।

निगम ने नियमों का हवाला देते हुए आवेदन खारिज कर दिया। उसका कहना था कि निर्धारित आयु सीमा पार कर चुकी मां को नौकरी नहीं दी जा सकती और मृत कर्मचारी के वयस्क भाई को अनुकंपा नियुक्ति के दायरे में शामिल करने का प्रावधान भी नहीं है।

एकल पीठ का आदेश खंडपीठ ने किया रद्द

निगम के फैसले को मां ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। अगस्त 2025 में एकल पीठ ने मानवीय आधार पर संगण्णा को उनकी शैक्षणिक योग्यता के अनुसार 12 सप्ताह में नौकरी देने का निर्देश दिया था। निगम ने इस आदेश को नियुक्ति नियमों के विरुद्ध बताते हुए खंडपीठ में अपील की थी।

खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि अनुकंपा नियुक्ति कोई जन्मसिद्ध या वंशानुगत अधिकार नहीं है। यह केवल उस परिवार को तत्काल राहत देने का सीमित प्रावधान है, जिसके कमाने वाले सदस्य की अचानक मृत्यु हो गई हो। अदालतें सहानुभूति के आधार पर नियमों से बाहर जाकर नए पात्रों का वर्ग नहीं बना सकतीं।

पीठ ने कहा कि मानवीय संवेदना महत्वपूर्ण है, लेकिन उसे कानून की सीमाओं के भीतर ही लागू किया जाना चाहिए। इसी आधार पर खंडपीठ ने एकल पीठ का आदेश रद्द कर दिया। इस फैसले की रिपोर्ट बार एंड बेंच ने प्रकाशित की है।

 

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By Bharat Ki Awaz

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