कांग्रेस को अल्पसंख्यक संगठनों की चेतावनी
दावणगेरे उपचुनाव के बाद बढ़ा असंतोष
कार्रवाई पर सवाल, पार्टी के भीतर भी उभरे मतभेद
हुब्बल्ली. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को राज्य के विभिन्न मुस्लिम संगठनों और अल्पसंख्यक समूहों ने कड़ा संदेश देते हुए स्पष्ट किया है कि सत्ता दिलाने वाले समुदाय को यदि सरकार और संगठन में उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिला, तो इसका राजनीतिक खामियाजा पार्टी को भुगतना पड़ सकता है। दावणगेरे दक्षिण उपचुनाव के बाद यह असंतोष खुलकर सामने आया है।
शीर्ष नेतृत्व को खुला पत्र
करीब 29 प्रतिनिधियों ने राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खरगे, सिद्धरामय्या, डी.के. शिवकुमार, के.सी. वेणुगोपाल और रणदीप सिंह सुरजेवाला सहित कई वरिष्ठ नेताओं को संबोधित करते हुए खुला पत्र लिखा है। पत्र में टिकट वितरण और मतदान के बाद पार्टी के व्यवहार को लेकर गंभीर नाराजगी जताई गई है।
‘समुदाय को गहरा आघात’
संगठनों का कहना है कि जिस मुस्लिम समुदाय ने 2023 विधानसभा चुनाव में एकजुट होकर कांग्रेस का समर्थन किया, उसी के साथ अब “संवेदनहीन” व्यवहार किया जा रहा है। पत्र में सवाल उठाया गया है कि “क्या बिना शर्त समर्थन देना हमारी गलती थी?” साथ ही चेतावनी दी गई है कि यदि स्थिति नहीं सुधरी तो भविष्य में राजनीतिक विकल्प खुले रखे जाएंगे।
पत्र पर हस्ताक्षर करने वालों में मौलाना सैयद तनवीर हाश्मी, अब्दुल खदीर साहेब, मौलाना शब्बीर अहमद नदवी और के.एस. मोहम्मद मसूद जैसे प्रमुख नाम शामिल हैं। उन्होंने सरकार और संगठन के निर्णयकारी पदों पर मुस्लिम समुदाय को उचित हिस्सेदारी देने की मांग की है।
पार्टी के भीतर भी मतभेद
दूसरी ओर, पार्टी के अंदर भी इस मुद्दे पर अलग-अलग राय सामने आई है। कुछ नेताओं ने दावणगेरे प्रकरण में की गई अनुशासनात्मक कार्रवाई का समर्थन करते हुए कहा कि पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल लोगों पर कार्रवाई आवश्यक है। केपीसीसी उपाध्यक्ष सईद अहमद और उबैदुल्लाह शरीफ ने स्पष्ट किया कि “व्यक्तिगत हितों के लिए पूरे समुदाय को गलत तरीके से प्रस्तुत करना उचित नहीं है।”
आलाकमान पर बढ़ता दबाव
इधर, मुख्यमंत्री के करीबी माने जाने वाले नेताओं का एक गुट कार्रवाई वापस लेने के पक्ष में सक्रिय हो गया है। मंत्री सतीश जारकीहोली ने सिद्धरामय्या, डॉ. जी. परमेश्वर और दिनेश गुंडूराव से मुलाकात कर इस मुद्दे पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि ऐसे फैसले जल्दबाजी में नहीं लेने चाहिए, दलित और अल्पसंख्यक हमारे प्रमुख मतदाता हैं, इसलिए पुनर्विचार जरूरी है।
पूर्व मंत्री के.एन. राजन्ना और विधान परिषद सदस्य बी.के. हरिप्रसाद ने भी कार्रवाई को “अतिशीघ्र” बताते हुए पहले अनुशासन समिति से प्रक्रिया पूरी करने की बात कही।
व्यापक असर पड़ सकता है
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, एक ओर अल्पसंख्यक संगठनों का दबाव बढ़ रहा है, वहीं पार्टी के भीतर मतभेद स्थिति को और जटिल बना रहे हैं। आने वाले दिनों में कांग्रेस नेतृत्व का निर्णय न केवल इस विवाद की दिशा तय करेगा, बल्कि राज्य की राजनीति पर भी इसका व्यापक असर पड़ सकता है।
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