मेंगलूरु में ‘आंशिक वन’ सर्वेक्षण अटकामेंगलूरु में ‘आंशिक वन’ सर्वेक्षण अटका

राजस्व अभिलेख, एफएमबी और ग्राम नक्शों में तालमेल नहीं

66,816 हेक्टेयर क्षेत्र की संयुक्त जांच प्रभावित

मेंगलूरु। जिले में वर्षों से चली आ रही ‘आंशिक वन’ संबंधी समस्या के स्थायी समाधान के लिए चल रहा वन विभाग और राजस्व विभाग का संयुक्त सर्वेक्षण अब अभिलेखों के आपसी मेल न खाने से अटकता नजर आ रहा है। सर्वेक्षण पूरा होने के बाद रिपोर्ट तैयार करने से पहले राजस्व टिप्पणी, एफएमबी (क्षेत्र मापन पुस्तिका) और ग्राम नक्शों का आपस में मिलान जरूरी है, लेकिन इन दस्तावेजों में तालमेल नहीं बैठ रहा है।

इसका सबसे बड़ा असर यह है कि कई मामलों में अभिलेखों के अनुसार वन क्षेत्र पहले की तुलना में कम दिखाई दे रहा है। वन विभाग ने उच्चतम न्यायालय के समक्ष अपने घोषणा-पत्र में जिले में करीब 1.30 लाख हेक्टेयर वन क्षेत्र बताया है। ऐसे में वन क्षेत्र बढऩे पर समस्या नहीं, लेकिन कम दर्ज होने की स्थिति में विभाग के सामने नई परेशानी खड़ी हो सकती है।

66,816 हेक्टेयर क्षेत्र की जांच

शिवमोग्गा वन विभाग की विशेष कार्ययोजना टीम ने पिछले वर्ष नवंबर में राजस्व विभाग के साथ मिलकर यह सर्वेक्षण शुरू किया था। इसे पिछले मार्च तक पूरा करने का लक्ष्य था। कडबा, बंटवाल, बेल्तंगडी, पुत्तूर और सुल्लिया तालुकों में कुल 66,816 हेक्टेयर ‘आंशिक वन’ क्षेत्र का सर्वेक्षण किया जाना है।

इन तालुकों में कुल 66 ब्लॉक ऐसे हैं, जिन्हें अभिलेखों में आंशिक वन के रूप में दर्ज किया गया है। इन क्षेत्रों में विकास कार्यों के लिए अनुमति और अनापत्ति प्रमाणपत्र (एनओसी) मिलने में दिक्कत होती है। साथ ही 94-सी और बगरहुकुम के तहत भूमि मंजूर करना भी संभव नहीं हो पाता। इस समस्या के समाधान की मांग ग्रामीण लंबे समय से करते आ रहे हैं।

क्या है ‘आंशिक वन’?

पुराने अभिलेखों के आधार पर आरटीसी के 11वें कॉलम में किसी भूमि को ‘आंशिक वन’ दर्ज कर दिए जाने पर सरकार के लिए उस क्षेत्र का अन्य योजनाओं में उपयोग करना मुश्किल हो जाता है। कई मामलों में अधिकांश जमीन राजस्व विभाग की होती है, लेकिन वन विभाग के रिकॉर्ड में पूरा क्षेत्र आंशिक वन के रूप में दर्ज रहता है।

संयुक्त सर्वेक्षण के दौरान सही प्लॉटिंग होने पर ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि कितनी भूमि वन विभाग की है और कितनी राजस्व विभाग की।

ब्रिटिशकालीन नक्शों से भी चुनौती

करीब 1850 के आसपास तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने सर्वेक्षण कर अधिसूचनाएं जारी की थीं। उस समय बड़े-बड़े ब्लॉकों का सर्वे किया जाता था। मौजूदा सर्वेक्षण में यदि ब्रिटिशकालीन अधिसूचना में दर्ज वन क्षेत्र के बराबर भूमि नहीं मिलती, तो आशंका रहती है कि उसका कुछ हिस्सा आसपास के दूसरे ब्लॉक में दर्ज हो गया हो। ऐसे में दूसरे ब्लॉक का भी सर्वे करना पड़ता है, जिससे प्रक्रिया धीमी हो रही है।

समय-सीमा बताना मुश्किल

राज्य के अन्य हिस्सों में ऐसी समस्या सामने नहीं आई है। यह हमारे जिले की विशिष्ट चुनौती है। फिलहाल राजस्व टिप्पणी और वन कार्ययोजना टीम के नक्शों में तालमेल नहीं बैठ रहा है। मामले को उच्च अधिकारियों के संज्ञान में लाया गया है। सर्वेक्षण जारी है, लेकिन इसके पूरा होने की समय-सीमा बताना मुश्किल है।
रविशंकर, उप वन संरक्षण अधिकारी, मेंगलूरु

 

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By Bharat Ki Awaz

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