यादगीर के मायलापुर में सदियों पुरंपरागत अनोखी परंपराएं
अमीर-गरीब सभी की अंतिम यात्रा बोरी पर
यादगीर। राष्ट्रीय राजमार्ग-150 के किनारे स्थित मायलापुर गांव अपनी प्राकृतिक सुंदरता के साथ अनूठी धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं के लिए भी जाना जाता है। चारों ओर चट्टानी पहाडिय़ां, झाडिय़ां, हरियाली और मूंगफली के खेतों के बीच स्थित इस गांव की पहाड़ी गुफा में भगवान शिव के स्वरूप माने जाने वाले मैलारलिंगेश्वर (मल्लय्या) का मंदिर है। गांव के लोग पीढिय़ों से यहां की धार्मिक परंपराओं का निष्ठापूर्वक पालन करते आ रहे हैं।
गांव में नहीं पालते मुर्गे
मायलापुर में मुर्गे पालने की परंपरा नहीं है। यहां मुर्गे की बांग भी सुनाई नहीं देती। ग्रामीणों का मानना है कि सुबह की पूजा के समय मैलारलिंगेश्वर को शंख, घंटी और जागटे की ध्वनि सुननी चाहिए, मुर्गे की बांग नहीं। इसी मान्यता के चलते पूर्वजों के समय से गांव में मुर्गे नहीं पाले जाते।
घर में चारपाई रखना भी वर्जित
गांव में किसी भी घर में चारपाई, गद्दा या तकिया रखने की परंपरा नहीं है। प्रसूता महिला हो या बीमार व्यक्ति, उन्हें भी चारपाई पर नहीं सुलाया जाता। विवाह के बाद बेटी को विदा करते समय अन्य घरेलू सामान दिए जाते हैं, लेकिन चारपाई नहीं दी जाती।
मंदिर के पुजारी खंडप्पा पुजारी के अनुसार, दीपावली के अवसर पर मैलारलिंगेश्वर और गंगिमालम्मा का विवाह उत्सव होता है। इस दौरान देवता को चारपाई, गद्दा, तकिया और चौकी अर्पित की जाती है। ग्रामीणों की मान्यता है कि देवता द्वारा उपयोग की जाने वाली वस्तुओं का इस्तेमाल मनुष्यों को नहीं करना चाहिए।
अंतिम यात्रा में भी अनोखी परंपरा
मायलापुर की सबसे अनोखी परंपरा मृत्यु संस्कार से जुड़ी है। गांव में किसी व्यक्ति की मृत्यु होने पर अंतिम यात्रा के लिए चौकी तैयार कर उस पर शव रखने की प्रथा नहीं है। गरीब हो या अमीर, पुजारी हो या मंदिर का धर्माधिकारी—हर व्यक्ति की अंतिम यात्रा पुरानी बोरी के बने तख्ते पर ही निकाली जाती है।
पुजारी ईश्वरप्पा अडगिमनी बताते हैं कि महाशिवरात्रि के पांच दिन बाद से चैत्र पूर्णिमा तक करीब 45 दिनों तक मल्लय्या की प्रतिमा को चौकी पर रखकर प्रतिदिन मंदिर की पांच परिक्रमा कराई जाती है। इसी कारण ग्रामीण चौकी का इस्तेमाल नहीं करते।
पीढिय़ों से कायम परंपरा
गांव में बर्तन बनाने का काम भी घरों के भीतर नहीं किया जाता। ग्रामीणों का कहना है कि मिट्टी के बर्तन बनाने की आवाज गांव में न सुनाई दे, इसलिए यह काम गांव के बाहर किया जाता है। संक्रांति और दीपावली पर पालकी उत्सव भी आयोजित होता है।
ग्रामीणों के अनुसार, इन परंपराओं में अमीर-गरीब का कोई भेद नहीं है। उनका विश्वास है कि परंपराओं का उल्लंघन करने से गांव पर विपत्ति आ सकती है। इसलिए पीढिय़ों से चली आ रही इन मान्यताओं को आज भी पूरी श्रद्धा के साथ निभाया जा रहा है।
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