रासायनिक उर्वरक की अनिश्चितता के बीच किसान पारंपरिक खाद की ओर लौटे
कुरुगोडु (बल्लारी). कृषि विभाग द्वारा एफआईडी आधारित व्यवस्था के तहत प्रति एकड़ केवल एक बोरी यूरिया उपलब्ध कराने के निर्देश के बाद जिले के किसानों का रुझान गोबर खाद की ओर बढ़ गया है। भूमि की उर्वरता बनाए रखने और संभावित यूरिया संकट से बचने के लिए किसान बड़ी मात्रा में गोबर खाद खरीद रहे हैं।
कृषि विभाग के अनुसार वैश्विक परिस्थितियों और युद्धजन्य प्रभावों के कारण यूरिया उत्पादन में उपयोग होने वाले कच्चे माल की उपलब्धता प्रभावित हुई है। इसी वजह से उपलब्ध यूरिया का समान वितरण सुनिश्चित करने के लिए नई व्यवस्था लागू की गई है।
बढ़ी गोबर खाद की कीमत
गोबर खाद की मांग बढऩे से इसके दामों में भी भारी वृद्धि हुई है। पहले एक ट्रैक्टर गोबर खाद लगभग 4 हजार रुपए में मिल जाती थी, लेकिन अब इसकी कीमत बढक़र 7 हजार रुपए तक पहुंच गई है। बड़े किसान खाद के गड्ढों के आकार के आधार पर 18 हजार से 30 हजार रुपए तक खर्च कर खाद खरीद रहे हैं।
पशुधन की कमी भी चिंता
किसानों का कहना है कि बदलती जीवनशैली के कारण पशुधन की संख्या लगातार घट रही है, जिससे गोबर खाद का उत्पादन भी कम हो गया है। वहीं सिंचित क्षेत्रों में पशुओं को खेतों में ठहराने का किराया भी बढ़ गया है। पिछले वर्ष जहां एक पशु के लिए प्रतिदिन एक रुपए लिया जाता था, वहीं इस वर्ष यह बढक़र चार रुपए हो गया है।
किसान दोड्डबसप्पा ने बताया कि जो किसान स्वयं पशुपालन करते हैं, वे अपनी जरूरत के अनुसार गोबर खाद तैयार कर लेते हैं और अतिरिक्त खाद बेचकर आय भी अर्जित करते हैं।
जैविक खेती की ओर बढ़ते कदम
विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान परिस्थितियों ने किसानों को एक बार फिर जैविक और पारंपरिक कृषि पद्धतियों की ओर प्रेरित किया है। यदि यह रुझान जारी रहा तो मिट्टी की सेहत सुधारने के साथ-साथ टिकाऊ कृषि को भी बढ़ावा मिलेगा।
भूमि की उर्वरता पर जोर
कृषि अधिकारी देवराज ने बताया कि रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग से मिट्टी की गुणवत्ता प्रभावित होती है। यही कारण है कि किसान फिर से पारंपरिक गोबर खाद के उपयोग को प्राथमिकता दे रहे हैं।
गोबर खाद में विभिन्न प्रकार के पोषक तत्व मौजूद
सहायक कृषि निदेशक गर्जेप्पा के अनुसार यूरिया केवल सीमित पोषक तत्व प्रदान करती है, जबकि गोबर खाद में विभिन्न प्रकार के पोषक तत्व मौजूद होते हैं। इसके उपयोग से मिट्टी की उर्वरता और जैविक गुणवत्ता दोनों में सुधार होता है।
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