कमजोर मानसून से तटीय कर्नाटक में जलस्तर घटा, जल संकट के संकेत
मेंगलूरु/उडुपी. कर्नाटक के तटीय जिलों में इस वर्ष कमजोर मानसून का असर अब नदियों पर भी साफ दिखाई देने लगा है। सामान्यत: मानसून शुरू होने के एक-दो सप्ताह बाद उफान पर रहने वाली पश्चिमी घाट से निकलने वाली नदियां इस बार अब तक सामान्य प्रवाह पर ही हैं। उडुपी और दक्षिण कन्नड़ जिलों की अधिकांश प्रमुख नदियों का जलस्तर चेतावनी स्तर से काफी नीचे बना हुआ है। मौसम की यह स्थिति न केवल कृषि और पेयजल आपूर्ति, बल्कि भूजल, जैव विविधता और पर्यावरण के लिए भी चिंता का विषय बन गई है।
नदियों में नहीं आया सामान्य मानसूनी उफान
उडुपी जिले की सौपर्णिका, वराही, सीता, चक्र, पापनाशिनी, स्वर्ण, मडिसालु होले, एडमाविन होले तथा सीमा क्षेत्र की शांभवी जैसी नदियां अभी तक सामान्य स्तर पर बह रही हैं। सीता नदी का जलस्तर 12.78 मीटर है, जबकि चेतावनी स्तर 14.85 मीटर है। वराही नदी 2.52 मीटर पर है, जबकि चेतावनी स्तर 6.5 मीटर निर्धारित है। स्वर्ण नदी का जलस्तर 20 मीटर है, जो चेतावनी स्तर 20.5 मीटर से थोड़ा ही नीचे है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि सामान्य मानसून के दौरान इन नदियों का पानी लालिमा लिए होता है, जो पश्चिमी घाट से बहकर आने वाली प्रचुर जलधारा का संकेत माना जाता है। इस बार नदी का पानी साफ दिखाई दे रहा है, जो घाट क्षेत्र में अपेक्षा से कम बारिश का संकेत माना जा रहा है।
पश्चिमी घाट में घटती नमी बनी बड़ी चिंता
पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि केवल एल-नीनो ही इस स्थिति के लिए जिम्मेदार नहीं है। पश्चिमी घाट में अनियंत्रित विकास, वनों पर बढ़ता दबाव, भूस्खलन और निर्माण गतिविधियों ने बारिश जल के भूमि में समाने की क्षमता कम कर दी है। परिणामस्वरूप बारिश का अधिकांश पानी सीधे नदियों के रास्ते समुद्र में पहुंच रहा है और भूजल का पुनर्भरण घटता जा रहा है।
विशेषज्ञों के अनुसार, यदि बारिश का वर्तमान पैटर्न जारी रहा तो आने वाले महीनों में नदियों के स्रोत और अधिक कमजोर हो सकते हैं तथा गर्मियों से पहले ही जल संकट गहरा सकता है।
बागवानी फसलों को नुकसान, धान पर नजर
उडुपी जिले में खरीफ धान की खेती अभी प्रारंभिक चरण में है, इसलिए उसकी क्षति का आकलन सितंबर के बाद ही संभव होगा। हालांकि तेज हवा, बारिश और आकाशीय बिजली से बागवानी फसलों को नुकसान पहुंचा है। कार्कल तालुक में 4.19 हेक्टेयर सुपारी की फसल प्रभावित हुई है, जिससे 25 से अधिक किसान प्रभावित हुए हैं और लगभग 19 लाख रुपए के नुकसान का अनुमान है। हेब्री तालुक में भी 2.96 हेक्टेयर सुपारी बागानों को क्षति पहुंची है।
पेयजल और सिंचाई पर बढ़ सकता है दबाव
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि आने वाले दिनों में पर्याप्त और लगातार बारिश नहीं हुई तो ग्रामीण क्षेत्रों में सिंचाई संकट गहरा सकता है। शहरों और गांवों की पेयजल योजनाओं पर भी दबाव बढ़ेगा, भूजल स्तर नीचे जा सकता है तथा नदियों पर निर्भर जैव विविधता प्रभावित हो सकती है। बांधों और बैराजों में पानी रोकने के बावजूद यदि पर्याप्त भंडारण नहीं हुआ तो गर्मियों में जल उपलब्धता बड़ी चुनौती बन सकती है।
अब फल्गुनी नदी की भी होगी निगरानी
अब तक दक्षिण कन्नड़ में केवल नेत्रावती और कुमारधारा नदियों के जलस्तर की नियमित निगरानी होती थी। इस वर्ष से गुरुपुर के निकट अड्डूर में फल्गुनी नदी का भी जलस्तर मापा जा रहा है। प्रशासन का यह कदम भविष्य में जल प्रबंधन की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
कमजोर मानसून ने फिलहाल किसी बड़े बाढ़ संकट को टाल दिया है, लेकिन इसके साथ ही भविष्य के संभावित जल संकट की गंभीर चेतावनी भी दे दी है। यदि आगामी सप्ताहों में पश्चिमी घाट में व्यापक और सतत बारिश नहीं हुई, तो तटीय कर्नाटक को आने वाले महीनों में पेयजल, सिंचाई और पर्यावरणीय संतुलन से जुड़ी बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।
विशेषज्ञों की प्रमुख सिफारिशें
-पश्चिमी घाट के नदी उद्गम क्षेत्रों के वनों का संरक्षण प्राथमिकता बने।
वर्षा जल संचयन को अनिवार्य रूप से लागू किया जाए।
-जल के विवेकपूर्ण उपयोग को बढ़ावा दिया जाए।
-तालाबों, कुओं, बैराजों और पारंपरिक जल स्रोतों का पुनर्जीवन किया जाए।
-नदी जलग्रहण क्षेत्रों में अनियंत्रित विकास गतिविधियों पर प्रभावी नियंत्रण रखा जाए।
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